Thursday, July 15, 2021

स्वतंत्रता || Swatantrata


बहुत समय पहले की बात है। एक चोर था वह चोरी की नियत से एक सेठ के घर में घुसा, लेकिन सेठ के घर में पाले गए कुत्तों को भनक लग गई और वह भोंकने लगे। चोर भाग कर सेठ की गौशाला में जा छिपा। गौशाला में कई गाय बन्धी थी। तभी एक चमत्कार हुआ। चोर ने महसूस किया कि वह  गायों की बातों को सुन और समझ सकता है।  उस गौशाला में एक बूढ़ी गाय थी जो एक नई नई आई गाय से बात कर रही थी। बूढ़ी गाय ने नई गाय से पूछा, "तुम तो नयी लगती हो, पहले तुमको यहां नहीं देखा"। नई गाय ने कहा, "मैं आज ही आई हूं, अब ना मालूम कितने दिन तक मुझे यहां बंद कर रहना पड़ेगा, पहले मैं जंगल में स्वतंत्रता पूर्वक विचरण करती थी"। बूढ़ी गाय ने कहा, "जो जिसका कर्जदार है, उसे तो कर्ज उतारना ही होगा"। नई गाय ने कहा, "मैं आपकी बात का मतलब नहीं समझी"। तब बूढ़ी गाय ने कहा कि मैं पिछले जन्म में एक चोर थी और मैंने इस सेठ के घर में इसके धन की चोरी की थी उस चोरी के कारण मुझे इस जन्म में गाय बनना पड़ा और जितना धन मैंने इस सेठ का चोरी किया था उस धन के बराबर मुझे दूध देकर भरपाई करनी है तभी मेरी मुक्ति हो पाएगी। गायों की बात सुनकर चोर सन्न रह गया। उसने निश्चय किया कि अब वह चोरी का काम नहीं करेगा बल्कि मेहनत मजदूरी करके जो कुछ भी प्राप्त होगा उसी से अपना जीवन यापन करेगा। इस प्रकार चोर ने चोरी का काम सदा के लिए छोड़ दिया और मेहनत तथा ईमानदारी के साथ सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा।

Wednesday, July 14, 2021

भोलू गौरी और टॉमी || Bholu, Gauri aur Tomy

 


एक गांव में भोलू नाम का एक लड़का रहता था उसकी मां बचपन में ही गुजर चुकी थी उसका पालन पोषण उसके पिता और गौरी ने किया था। गौरी कौन है? गौरी है उसकी प्यारी गाय। वह गौरी को बहुत प्यार करता था और गौरी भी उसे पुत्रवत स्नेह करती थी। भोलू ने एक कुत्ता भी पाल रखा था जिसका नाम टॉमी था। एक दिन उसके घर में उसके मामा जी आए और उन्होंने गाय अपने घर ले जाने की इच्छा जाहिर की। भोलू के पिताजी उन्हें मना कर सके अगले दिन सुबह उसके मामा गाय को अपने साथ ले गए। गौरी के जाने से भोलू बहुत दुखी रहने लगा और अब वह टॉमी के साथ खेलता भी नहीं था। एक दिन भोलू टॉमी के साथ उदास बैठा था तभी उसने टॉमी से कहा कि गौरी के बिना उसका मन नहीं लगता इसीलिए वह बहुत दुखी रहता है। उस दिन शाम से ही टॉमी दिखाई नहीं दिया। भोलू को बड़ी चिंता हुई कि पहले गौरी गई और अब टॉमी भी कहीं चला गया। दुखी मन से उस की रात बीती। अगली सुबह उसके कानों में गौरी की आवाज सुनाई दी उसे लगा कि वह सपना देख रहा है लेकिन गौरी की आवाज बार-बार सुनाई देने पर वह उठा और बाहर निकल कर देखा तो गौरी खड़ी थी। वह जाकर गौरी से लिपट गया और गौरी भी उसे दुलार करने लगी। गोलू ने देखा गौरी की रस्सी बुरी तरह कुतरी गई थी। उसे यह समझते देर लगी की गौरी की रस्सी को टॉमी ने ही कुतरा होगा। जो भी हो भोलू गौरी और टॉमी को साथ पाकर बहुत खुश हुआ।

Tuesday, July 13, 2021

चरवाहा || Charwaha

 


एक चरवाहा था। वह रोज गाय चराने जाता था। उसके साथ उसका पालतू कुत्ता भी जरूर जाता था। वह दिन भर अपने कुत्ते के साथ खेलता और शाम को गायों को वापस लेकर के गांव जाता था। रोज की तरह एक दिन वह गाय चराने गया और एक घने पेड़ के नीचे बैठकर सोचने लगा कि एक दिन उसके पास भी ढेर सारी गाय हो जाएंगी और वह खूब सारा दूध देंगी। जिन्हें बेचकर वह बहुत अमीर हो जाएगा। जाने कब तक वह अपने दिवास्वप्न में डूबा रहा कि उसे यह भी नहीं पता चला कि उसकी गाय किधर चली गई। जब उसे होश आया तो शाम होने वाली थी और आसपास गायों का अता पता ही नहीं था। वह बहुत दुखी हुआ और अपने कुत्ते के पास बैठकर दुखी मन से बड़बड़ाने लगा, " जाने मेरी गाय कहां गई, अब मैं बिना गायों के घर कैसे जाऊंगा, अगर घर गया तो जरूर मेरी पिटाई होगी।" तभी उसने देखा कि उसका कुत्ता एक तरफ भोंकते हुए भागा जा रहा है वह भी अपने कुत्ते के पीछे दौड़ने लगा। थोड़ी दूर जाकर के उसने देखा कि उसकी गाय झाड़ियों के पीछे चर रही थी। गायों को पाकर वह बहुत खुशी हुआ और कुत्ते और गाय को लेकर वापस अपने घर गया।

Monday, July 12, 2021

दिवास्वप्न || Day Dreaming



एक गांव में एक ग्वाला था। उसके घर में कई गाय थी जिनका दूध वह अपने गांव के लोगों को बेचने के लिए रोज जाता था। एक दिन वह दूध लेकर जा रहा था और मन ही मन सोच रहा था कि अभी उसके पास जितनी गाय हैं कुछ दिन बाद उसकी दोगुनी गाय उसके पास होंगी और उसके कुछ दिन बाद उससे भी दोगुनी गाय उसके पास हो जाएंगी। तब उसके पास बेचने के लिए बहुत ढेर सारा दूध भी हो जाएगा। इस प्रकार दूध बेच बेच कर वह बहुत अमीर हो जाएगा। इसी प्रकार दिवास्वप्न देखते हुए वह आगे बढ़ता जा रहा था कि तभी उसका पैर जमीन पर बैठे हुए एक कुत्ते से टकरा गया। कुत्ता पें- पें करते हुए भागा लेकिन तब तक उस लड़के का सारा दूध गिर चुका था। भविष्य में होने वाले लाभ के बारे में सोचते सोचते वह अपने वर्तमान के लाभ से भी हाथ धो बैठा।


Friday, May 8, 2020

Winners Never Quit Quitters Never Win


अखंड भारत पब्लिक स्कूल। जी हां यह वही विद्यालय है जिसने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को आधार बनाया और इसके छात्र देश ही नहीं वरन विदेशों में भी अपनी सर्वोच्च सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। इस विद्यालय ने अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूरे कर लिए गए हैं जिस के उपलक्ष्य में स्वर्णिम जयंती समारोह का आयोजन किया जा रहा है। समारोह में देश-विदेश से हजारों की संख्या में पुरा छात्र एवं उनके परिवार एकत्रित हुए हैं जिसकी शोभा देखते ही बनती है। वैसे तो स्वर्णिम जयंती समारोह के उपलक्ष में अनेकानेक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है किंतु आज का कार्यक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज का कार्यक्रम पूर्णतया सैन्य सेवाओं को समर्पित है।

आपको बताते चलें कि इस विद्यालय में जितने छात्र विभिन्न सेवा में दिए हैं उससे कहीं ज्यादा छात्र रक्षा सेवाओं में अधिकारी के रूप में दिए हैं। यही कारण है कि आज का 1 दिन का कार्यक्रम रक्षा सेवाओं को समर्पित करते हुए आयोजित किया गया है आज का आयोजन अपने पूर्व नियोजित कार्यक्रमों के अनुसार ही संचालित हो रहा है। तभी अचानक भारत के थल सेना अध्यक्ष की ओर से एक संदेश प्राप्त हुआ है (जो स्वयं भी इस विद्यालय के पूरा छात्र हैं और कार्यक्रम में उपस्थित भी हैं) जिसके अनुसार कार्यक्रम में थोड़ा फेरबदल करना पड़ रहा है। थल सेना अध्यक्ष के निर्देशानुसार एक विशेष सभा का आयोजन किया जाना है जिसमें उनके बैच के एक पूरा छात्र विशेष सभा में समस्त वर्तमान छात्रों को संबोधित करेंगे। यह कार्यक्रम पूर्व में निर्धारित नहीं था इसलिए विद्यालय प्रशासन ऊहापोह की स्थिति में आ गया कि यह अचानक से ऐसा कार्यक्रम रखने की क्या आवश्यकता पड़ गई।

बहरहाल निर्देशानुसार निश्चित समय पर विशेष सभा का आयोजन किया गया। स्वयं थल सेनाध्यक्ष ने मुख्य वक्ता का परिचय सभा में उपस्थित समस्त सदस्यों को कराया। हालांकि उनके द्वारा कराया गया परिचय मुख्य वक्ता के हाव भाव से किसी भी तरह से मेल नहीं खाता था। थल सेना अध्यक्ष जी ने परिचय कराते हुए बताया कि श्री रमेश कुमार जी मुख्य वक्ता उनके समय के विद्यालय कप्तान रह चुके हैं साथ ही साथ पढ़ाई तथा अन्य शैक्षणिक गतिविधियों में भी अव्वल दर्जे के विद्यार्थी रहे हैं। क्योंकि आज का कार्यक्रम सैन्य अधिकारियों को समर्पित था इसलिए एक गैर सैन्य व्यक्ति का उद्बोधन कार्यक्रम के बीच में रखना किसी के गले नहीं उतर रहा था। सेनाध्यक्ष के द्वारा परिचय के उपरांत मुख्य वक्ता ने अपना वक्तव्य देना शुरू किया।

Winners never quit Quitters never win.
इन शब्दों के साथ श्री रमेश कुमार जी ने लड़खड़ाती आवाज में अपना उद्बोधन प्रारंभ किया। 

मेरी समझ में नहीं आता कि कहां से शुरू करूं। उन दिनों कक्षा ग्यारहवीं के बाद एनडीए में एंट्री हो जाया करती थी मैं अपने अन्य साथियों के साथ अपने प्रथम प्रयास में ही सफल रहा और एनडीए ज्वाइन किया। अपने विद्यालय में मैं हर क्षेत्र में अव्वल रहा आया था किंतु एनडीए पहुंचकर मुझे ज्ञान हुआ कि दुनिया वीरों से खाली नहीं है NDA में पूरे भारत के सर्वश्रेष्ठ छात्र प्रवेश प्राप्त करते हैं उन छात्रों को देखकर मैं धीरे-धीरे हीन भावना का शिकार होने लगा क्योंकि मैं सदैव अव्वल ही आना चाहता था जिसके लिए निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता होती है एनडीए पहुंचकर मैंने यह मान लिया कि मेरे जीवन का लक्ष्य पूरा हो गया है और अब मुझे आगे और मेहनत करने की आवश्यकता नहीं है यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी भूल साबित हुई। धीरे-धीरे मैं अपने अन्य साथियों से पिछड़ने लगा और हीन भावना मेरे अंदर घर करती गई। यह हीन भावना मेरे अंदर इतने गहरे में समा गई कि 1 दिन मैंने एनडीए छोड़ने का निश्चय कर लिया। मेरे इंस्ट्रक्टर ने मुझे बहुत समझाया और बहुत मौके दिए कि मैं अपने विचार को बदल दूं लेकिन मैं अपनी जिद पर अड़ा रहा और अंत में अपने माता पिता के सपनों को तिलांजलि देते हुए एनडीए छोड़ दिया। घर आकर मैंने अपने पिता से इंजीनियरिंग करने की इच्छा जाहिर की वैसे तो मेरे पिताजी एक मध्यम परिवार से आते थे किंतु उन्होंने आज तक मेरी हर इच्छा का सम्मान किया था और उन्होंने इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए मुझे सहर्ष अनुमति दे दी । इंजीनियरिंग में दाखिले के बाद मैंने देखा ऐसे बहुत से छात्र मुझे वहां मिले जो मुझसे जूनियर हुआ करते थे और वे आज मुझसे सीनियर है। फिर मेरे मन का भगोड़ा जाग उठा और मैंने इंजीनियरिंग भी छोड़ने का निश्चय कर लिया । किंतु इस बार मेरे पिता की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि वह मुझे खुले मन से सहयोग कर पाते उन्होंने मुझे बार-बार कहा कि बेटा केवल कुछ वर्षों की ही बात है पढ़ाई पूरी कर ले फिर जो करना होगा कर लेना। लेकिन मैंने एक न सुनी। 

समय हमेशा एक सा नहीं रहता। कुछ ही समय में पिताजी की मृत्यु हो गई।  पिताजी के मृत्यु के पश्चात घर की सारी जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई। उसी समय मुझे पता चला कि पिताजी ने अपनी समस्त पूंजी मेरी पढ़ाई पर खर्च कर दी थी जो कुछ बची कुची पूंजी थी जब मैंने एनडीए छोड़ी तो वहां के सारे खर्चे भरने में उन्हें जमा करनी पड़ी । उसके बाद मेरी इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ा जिसकी भरपाई भी आजीवन करते रहे और अंत में स्वर्ग सिधार गए । उनके स्वर्ग सिधारने के बाद मेरे ऊपर जिम्मेदारियों का पहाड़ टूट पड़ा। अब मैं चाह कर के भी समय को वापस नहीं ला सकता था। मैं सोचने लगा काश मैंने एनडीए न छोड़ा होता । काश मैंने इंजीनियरिंग ही कर लिया होता। लेकिन अब तो समय बीत चुका था । 

मैं इधर-उधर छोटी मोटी नौकरियों की तलाश में भटकने लगा लेकिन कहीं पर कुछ काम नहीं मिला और समय बड़ी कठिनाई से बीतने लगा। उस जमाने में तो आज के जैसे व्हाट्सएप फेसबुक सोशल मीडिया जैसी चीजें नहीं थी इसलिए मैं पूरी तरह से अज्ञातवास में चला गया। जैसे तैसे मुझे एक बैंक में छोटे से क्लर्क की नौकरी मिल गई और मेरा गुजारा चलने लगा लेकिन मेरे दोस्त हमेशा मेरे बारे में चिंतित रहा करते थे वह मुझसे संपर्क करना चाहते थे लेकिन मैं किसी ना किसी बहाने से उनसे बचने की ही कोशिश किया करता था मेरे अंदर की हीन भावना मुझे उनका सामना करने का साहस नहीं देती थी।

 किंतु आज जब विद्यालय का 50 वां स्थापना दिवस का समारोह था तो माननीय थल सेना अध्यक्ष जी ने मुझसे कहा की तुम्हारा अनुभव हमारे भावी छात्रों के लिए एक मार्गदर्शन का कार्य करेगा। मुझे भी लगा कि मैंने अपना जीवन व्यर्थ ही नष्ट कर दिया। हो सकता है कि मैं किसी बच्चे के भविष्य को बनाने के किसी काम आ सकूं। बस इतनी सी मेरी कहानी है और यही बताने के लिए मैं यहां आया था। मेरा सभी बच्चों को यही संदेश है कि हमें इस विद्यालय तक पहुंचाने में हमारे मां-बाप ने अथक परिश्रम किया है। उनके सपने पूरे करने की जिम्मेदारी हम सब की है। वह हमसे कुछ उम्मीद नहीं करते वह केवल हमारी सफलता देखना चाहते हैं । इसलिए मैं आप सबको यही समझाना चाहता हूं कि आप जीवन के लक्ष्य से कभी भी ना भटके। मैंने जो भूले की है वह आप अपने जीवन में कभी न करें मैंने अपने माता पिता के सपनों को चकनाचूर कर दिया जिसका दुख मुझे पूरे जीवन में रहेगा जिसकी भरपाई मैं चाह कर भी कभी नहीं कर सकूंगा लेकिन मैं चाहूंगा कि आप अपने जीवन में कभी भी ऐसी गलती ना करें और मेरा मूल मंत्र आप नोट करने की। Winners never quit Quitters never win.

रमेश कुमार जी के उद्बोधन के पश्चात सभा का समापन हुआ सभी छात्रों ने अपने मन में निश्चय कर लिया कि वे जहां तक संभव हो सके अपने माता पिता के सपनों को साकार करने की पूरी कोशिश करेंगे और साथ ही उन्होंने अपना मूल मंत्र बना लिया की Winners never quit Quitters never win.

Thursday, May 7, 2020

नो कास्ट नो रिलीजन नो गॉड No Cast No Religion No God

''नो कास्ट नो रिलीजन नो गॉड''

दो युवाओं के द्वारा ''नो कास्ट नो रिलीजन नो गॉड'' की मुहिम को आगे बढ़ाने की सराहना की जानी चाहिए।  इससे ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ हद तक हम समाज में व्याप्त जातिगत धर्मगत एवं पंथगत मतभेदों को मिटा सकेंगे, किंतु क्या वास्तव में यह ऐसा ही है जैसा सुनने में लगता है । 

पहले चर्चा करते हैं नो कास्ट पर । हिंदू मान्यता के अनुसार ऐसा माना जाता है कि जाति व्यवस्था ऋग्वेद कालीन है । वर्ण शब्द 'वृ' धातु से बना है जिसका तात्पर्य होता है वरण करना । प्रारंभ में यह व्यवस्था कर्म आधारित थी किंतु कालांतर में यह जन्म आधारित हो गई जो कि इस व्यवस्था का विकृत रूप कहा जा सकता है। अब यदि हम अपने दैनिक जीवन में विचार करें तो हम पाएंगे कि हम सभी अपने जीवन में वरण या वर्ग विभाजन करते हैं और हर वस्तु एवं व्यक्ति को वर्णों में विभक्त करते हैं यथा दोस्त, दुश्मन, अमीर, गरीब, रोजगार वाला, बेरोजगार, व्यापारी, भिखारी, राजनीतिक, वैज्ञानिक, अधिकारी, अधिवक्ता, शिक्षक, छात्र आदि आदि । विदेशों में भी हमें टेलर , वुड्समैन पेंटर आदि सरनेम देखने को मिलते हैं । और तो और जब हम अपने पहनने के लिए कपड़े खरीदते हैं तब भी उनका वर्ण विभाजन करते हैं , यथा यह समारोह वाला , यह रोज पहनने वाला, यह कार्यालय जाने वाला आदि । वर्ण व्यवस्था का विस्तृत स्वरूप हमें विज्ञान के क्षेत्र में आवर्त सारणी एवं जंतु वर्गीकरण के रूप में भी दिखाई देता है।

अब नो रिलिजन की चर्चा करते हैं।  हिंदू शास्त्रों के अनुसार जो धारण करने योग्य है वही धर्म है । यह धर्म की बहुत व्यापक परिभाषा है जो यह बताती है कि हम अपने जीवन में क्या धारण करते हैं । इस परिभाषा के अनुसार धर्म केवल मंदिर में जाकर यज्ञ अनुष्ठान करना नहीं है , वरन हर वह कार्य है जिसे हम संकल्प रूप में अपने जीवन में धारण करते हैं । धर्म का संबंध केवल पूजा पद्धति ना होकर हर वह क्रिया है जो किसी मत के अनुसार करणीय है । इस मान्यता के आधार पर हम यह भी कह सकते हैं कि हम यदि किसी धर्म को ना माने फिर भी हम धर्म विमुख न रह सकेंगे क्योंकि हर व्यक्ति जिस पेशे से जुड़ा है उस पेशे के सभी करणीय कार्य उसके धर्म का निर्माण करते हैं जैसे छात्र का छात्र धर्म , मानव का मानवता धर्म और तो और डॉक्टर ,वकील ,अभियंता ,अधिकारी ,पुलिस, कर्मचारी और सैनिक आदि का भी एक धर्म होता है जिसकी मर्यादा में रहकर उन्हे कार्य करना पड़ता है।

अब आते हैं अंतिम बिंदु यानी नो गॉड पर।  अनेक धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ईश्वर को नियंता के रूप में स्वीकार किया गया है जो इस संपूर्ण चराचर जगत का नियंत्रण करता है एवं संसार की समस्त शक्तियां ईश्वर द्वारा संचालित होती हैं। विश्व का एक वर्ग ऐसा भी है जो ईश्वर में बिल्कुल विश्वास नहीं करता फिर भी अपने जीवन की समस्त गतिविधियों को उसी प्रकार संचालित करता है जैसे एक आस्तिक व्यक्ति करता है। स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई जी ने तो नास्तिक को सबसे बड़ा आस्तिक माना है क्योंकि उसकी नास्तिकता में अटूट श्रद्धा होती है । ईश्वर को मानना या ना मानना किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अंग हो सकता है किंतु प्रायः देखा जाता है कि हर व्यक्ति किसी न किसी व्यक्ति को अपने आदर्श के रूप में स्वीकार करता है जिसके जैसा वह स्वयं बनना चाहता है और इसीलिए वह उसका अनुकरण भी करता है । यही धारणा ईश्वर का भी निर्माण करती है, ऐसा कहा जा सकता है । किंतु जब इस धारणा में अंधविश्वास, अंधानुकरण एवं अंधश्रद्धा का बोलबाला हो जाता है , तो व्यक्ति केवल अपनी ही सुनता है और अपनी ही बात सभी लोगों से मनवाना भी चाहता है और यही विकृत रूप ग्रहण कर लेती है और समाज के लिए घातक सिद्ध होती है।

सारांश रूप में हम यह कह सकते हैं कि इन दोनों युवाओं का प्रयास सराहनीय है किंतु हजारों वर्षों के अनुभव एवं ज्ञान को एक झटके में तिलांजलि दे देना क्या हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए न्याय संगत एवं हितकारी होगा इस पर भी विचार किया जाना आवश्यक है। समय की मांग है कि हम जागरूक बने एवं समाज के हर व्यक्ति को जागरूक करें, जिससे कि एक ऐसे समाज का निर्माण हो सके जिसमें हर व्यक्ति को व्यक्ति की गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार मिल सके।

Wednesday, May 6, 2020

फेक न्यूज़ क्या है ।। What is Fake News

Fake News

फेक न्यूज़ एक अंग्रेजी शब्द है जिसका हिंदी अनुवाद झूठी खबरें या मिथ्या समाचार है। संकुचित अर्थों में फेक न्यूज़ के अंतर्गत वह खबर सम्मिलित की जाती है जो कि सत्य नहीं है, किंतु इसके व्यापक अर्थ के अंतर्गत अनेक चीजों को सम्मिलित किया जा सकता है, जैसे तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करना, एकांगी दृष्टि से रिपोर्टिंग करना, तथ्यों की गहराई में ना जाना, बिना पुष्टि के आनन फानन में समाचार को आगे बढ़ा देना ।

यदि हम फेक न्यूज़ की उत्पत्ति पर प्रकाश डालें तो हमें यह ज्ञात होगा कि फेक न्यूज़ का चलन कोई नया नहीं है, वरन् यह बहुत ही पुराना है। राजा महाराजा के जमाने से चल रहा फेक न्यूज़ का धंधा प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध तक आते-आते बहुत व्यापक रूप में सामने आया। फेक न्यूज़ या प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल द्वितीय विश्व युद्ध में तकनीकी विकास के साथ राज्य प्रायोजित हुआ और खूब फला फूला ।

जैसे-जैसे संचार क्रांति का युग आया एक न्यूज़ के फैलने की गति भी बहुत तेज होती गई । पुराने समय में कोई फेक न्यूज़ अपनी धीमी रफ्तार के कारण जहां एक सीमित क्षेत्र को ही प्रभावित कर पाती थी , वहीं यह आज पूरे देश एवं विश्व को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।

एक सच्चे पत्रकार का नैतिक दायित्व है कि वह तटस्थ रहकर किसी खबर की हर दृष्टि से पड़ताल करें, समाचार की पुष्टि होने पर ही उसे आगे बढ़ाएं, जरा भी संदेह होने या विश्वस्त सूत्रों से पुष्टि न होने पर उसे आगे ना बढ़ाएं ।

वर्तमान समय सोशल मीडिया का युग है और इस समय ऐसे बहुत से माध्यम है जिसमें कोई भी व्यक्ति, जो कि प्रशिक्षित संवाददाता नहीं है, कहीं से भी कोई भी खबर सार्वजनिक कर सकता है। कभी-कभी यह फेक न्यूज़ किसी व्यक्ति, उत्पाद, समाज, धर्म , संप्रदाय, मान्यता आदि को निशाना बनाकर वायरल की जाती है, जिनके अत्यंत घातक परिणाम समाज को देखने को मिलते हैं । आज के समय में अनेक राजनीतिक पार्टियां अपना प्रचार एवं दूसरी पार्टी का दुष्प्रचार करने के लिए बाकायदा आईटी सेल का गठन कर प्रायोजित कार्यक्रम चला रही है।  इसी क्रम में एक देश दूसरे देश के विरुद्ध ऐसे कार्यक्रमों का संचालन कर रहे हैं जो कि पत्रकारिता के मानदंडों के बिल्कुल विपरीत है।

 आज के इंटरनेट के युग में किसी भी सूचना की सत्यता की पड़ताल करना अब उतना मुश्किल नहीं रह गया है, जितना कि पहले हुआ करता था। अतः सारांश रूप में यह कहा जा सकता है कि हम चाहे पत्रकार हों या आम नागरिक, हमारे पास आने वाली हर खबर को तभी आगे भेजें जब उसकी विश्वसनीयता की पड़ताल अपने स्तर से कर ले।खासतौर से उन खबरों के प्रति अत्यंत सचेत रहने की आवश्यकता है जो हमारे समाज एवं देश को तोड़ने का कार्य कर सकती हैं।

Tuesday, May 29, 2018

वैद्य जी की सेवा || Vaidya Ji Ki Sewa


(आभार - यह रचना मुझे Whatsapp पर प्राप्‍त हुईप्रेरक लगी तो ब्‍लाग पर पोस्‍ट कर दिया। लेखक का नाम अज्ञात है फिर भी मैं अज्ञात लेखक के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।)

एक पुरानी सी इमारत में था वैद्यजी का मकान था। पिछले हिस्से में रहते थे और अगले हिस्से में दवाख़ाना खोल रखा था।  उनकी पत्नी की आदत थी कि दवाख़ाना खोलने से पहले उस दिन के लिए आवश्यक सामान एक चिठ्ठी में लिख कर दे देती थी।  वैद्यजी गद्दी पर बैठकर पहले भगवान का नाम लेते फिर वह चिठ्ठी खोलते। पत्नी ने जो बातें लिखी होतीं, उनके भाव देखते, फिर उनका हिसाब करते। फिर परमात्मा से प्रार्थना करते कि हे भगवान ! मैं केवल तेरे ही आदेश के अनुसार तेरी भक्ति छोड़कर यहाँ दुनियादारी के चक्कर में आ बैठा हूँ।वैद्यजी कभी अपने मुँह से किसी रोगी से फ़ीस नहीं माँगते थे। कोई देता था, कोई नहीं देता था किन्तु एक बात निश्चित थी कि ज्यों ही उस दिन के आवश्यक सामान ख़रीदने योग्य पैसे पूरे हो जाते थे, उसके बाद वह किसी से भी दवा के पैसे नहीं लेते थे चाहे रोगी कितना ही धनवान क्यों न हो। 

एक दिन वैद्यजी ने दवाख़ाना खोला। गद्दी पर बैठकर परमात्मा का स्मरण करके पैसे का हिसाब लगाने के लिए आवश्यक सामान वाली चिट्ठी खोली तो वह चिठ्ठी को एकटक देखते ही रह गए। एक बार तो उनका मन भटक गया। उन्हें अपनी आँखों के सामने तारे चमकते हुए नज़र आए किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपनी तंत्रिकाओं पर नियंत्रण पा लिया। आटे-दाल-चावल आदि के बाद पत्नी ने लिखा था, "बेटी का विवाह 20 तारीख़ को है, उसके दहेज का सामान।" कुछ देर सोचते रहे फिर बाकी चीजों की क़ीमत लिखने के बाद दहेज के सामने लिखा, '' यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।''

एक-दो रोगी आए थे। उन्हें वैद्यजी दवाई दे रहे थे। इसी दौरान एक बड़ी सी कार उनके दवाखाने के सामने आकर रुकी। वैद्यजी ने कोई खास तवज्जो नहीं दी क्योंकि कई कारों वाले उनके पास आते रहते थे। दोनों मरीज दवाई लेकर चले गए। वह सूटेड-बूटेड साहब कार से बाहर निकले और नमस्ते करके बेंच पर बैठ गए। वैद्यजी ने कहा कि अगर आपको अपने लिए दवा लेनी है तो इधर स्टूल पर आएँ ताकि आपकी नाड़ी देख लूँ और अगर किसी रोगी की दवाई लेकर जाना है तो बीमारी की स्थिति का वर्णन  करें। वह साहब कहने लगे "वैद्यजी! आपने मुझे पहचाना नहीं। मेरा नाम कृष्णलाल है लेकिन आप मुझे पहचान भी कैसे सकते हैं? 
क्योंकि मैं 15-16 साल बाद आपके दवाखाने पर आया हूँ। 

आप को पिछली मुलाकात का हाल सुनाता हूँ, फिर आपको सारी बात याद आ जाएगी। जब मैं पहली बार यहाँ आया था तो मैं खुद नहीं आया था अपितु ईश्वर मुझे आप के पास ले आया था क्योंकि ईश्वर ने मुझ पर कृपा की थी और वह मेरा घर आबाद करना चाहता था। हुआ इस तरह था कि मैं कार से अपने पैतृक घर जा रहा था।
बिल्कुल आपके दवाखाने के सामने हमारी कार पंक्चर हो गई। ड्राईवर कार का पहिया उतार कर पंक्चर लगवाने चला गया। आपने देखा कि गर्मी में मैं कार के पास खड़ा था तो आप मेरे पास आए और दवाखाने की ओर इशारा किया और कहा कि इधर आकर कुर्सी पर बैठ जाएँ। अँधा क्या चाहे दो आँखें और कुर्सी पर आकर बैठ गया। ड्राइवर ने कुछ ज्यादा ही देर लगा दी थी। एक छोटी-सी बच्ची भी यहाँ आपकी मेज़ के पास खड़ी थी और बार-बार कह रही थी, '' चलो न बाबा, मुझे भूख लगी है। आप उससे कह रहे थे कि बेटी थोड़ा धीरज धरो, चलते हैं।मैं यह सोच कर कि इतनी देर से आप के पास बैठा था और मेरे ही कारण आप खाना खाने भी नहीं जा रहे थे। मुझे कोई दवाई खरीद लेनी चाहिए ताकि आप मेरे बैठने का भार महसूस न करें। मैंने कहा वैद्यजी मैं पिछले 5-6 साल से इंग्लैंड में रहकर कारोबार कर रहा हूँ। इंग्लैंड जाने से पहले मेरी शादी हो गई थी लेकिन अब तक बच्चे के सुख से वंचित हूँ। यहाँ भी इलाज कराया और वहाँ इंग्लैंड में भी लेकिन किस्मत ने निराशा के सिवा और कुछ नहीं दिया।"  आपने कहा था, "मेरे भाई! भगवान से निराश न होओ। याद रखो कि उसके कोष में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है। आस-औलाद, धन-इज्जत, सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु सब कुछ उसी के हाथ में है। यह किसी वैद्य या डॉक्टर के हाथ में नहीं होता और न ही किसी दवा में  होता है। जो कुछ होना होता है वह सब भगवान के आदेश से होता है। औलाद देनी है तो उसी ने देनी है। मुझे याद है आप बातें करते जा रहे थे और साथ-साथ पुड़िया भी बनाते जा रहे थे। सभी दवा आपने दो भागों में विभाजित कर दो अलग-अलग लिफ़ाफ़ों में डाली थीं और फिर मुझसे पूछकर आप ने एक लिफ़ाफ़े पर मेरा और दूसरे पर मेरी पत्नी का नाम लिखकर दवा उपयोग करने का तरीका बताया था। मैंने तब बेदिली से वह दवाई ले ली थी क्योंकि मैं सिर्फ कुछ पैसे आप को देना चाहता था। लेकिन जब दवा लेने के बाद मैंने पैसे पूछे तो आपने कहा था,  बस ठीक है। मैंने जोर डाला, तो आपने कहा कि आज का खाता बंद हो गया है। मैंने कहा मुझे आपकी बात समझ नहीं आई। इसी दौरान वहां एक और आदमी आया उसने हमारी चर्चा सुनकर मुझे बताया कि खाता बंद होने का मतलब यह है कि आज के घरेलू खर्च के लिए जितनी राशि वैद्यजी ने भगवान से माँगी थी वह ईश्वर ने उन्हें  दे दी है। अधिक पैसे वे नहीं ले सकते। मैं कुछ हैरान हुआ और कुछ दिल में लज्जित भी कि मेरे  विचार कितने निम्न थे और यह सरलचित्त वैद्य कितना महान है।
मैंने जब घर जा कर पत्नी को औषधि दिखाई और सारी बात बताई तो उसके मुँह से निकला वो इंसान नहीं कोई देवता है और उसकी दी हुई दवा ही हमारे मन की मुराद पूरी करने का कारण बनेंगी। आज मेरे घर में दो फूल खिले हुए हैं। हम दोनों पति-पत्नी हर समय आपके लिए प्रार्थना करते रहते हैं। इतने साल तक कारोबार ने फ़ुरसत ही न दी कि स्वयं आकर आपसे धन्यवाद के दो शब्द ही कह जाता। इतने बरसों बाद आज भारत आया हूँ और कार केवल यहीं रोकी है।वैद्यजी हमारा सारा परिवार इंग्लैंड में सेटल हो चुका है। केवल मेरी एक विधवा बहन अपनी बेटी के साथ भारत में रहती है। हमारी भान्जी की शादी इस महीने की 21 तारीख को होनी है। न जाने क्यों जब-जब मैं अपनी भान्जी के भात के लिए कोई सामान खरीदता था तो मेरी आँखों के सामने आपकी वह छोटी-सी बेटी भी आ जाती थी और हर सामान मैं दोहरा खरीद लेता था। मैं आपके विचारों को जानता था कि संभवतः आप वह सामान न लें किन्तु मुझे लगता था कि मेरी अपनी सगी भान्जी के साथ जो चेहरा मुझे बार-बार दिख रहा है वह भी मेरी भान्जी ही है। मुझे लगता था कि ईश्वर ने इस भान्जी के विवाह में भी मुझे भात भरने की ज़िम्मेदारी दी है।

वैद्यजी की आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गईं और बहुत धीमी आवाज़ में बोले, ''कृष्णलाल जी, आप जो कुछ कह रहे हैं मुझे समझ नहीं आ रहा कि ईश्वर की यह क्या माया है। आप मेरी श्रीमती के हाथ की लिखी हुई यह चिठ्ठी देखिये।" और वैद्यजी ने चिट्ठी खोलकर कृष्णलाल जी को पकड़ा दी। वहाँ उपस्थित सभी यह देखकर हैरान रह गए कि ''दहेज का सामान'' के सामने लिखा हुआ था '' यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।'' काँपती-सी आवाज़ में वैद्यजी बोले, "कृष्णलाल जी, विश्वास कीजिये कि आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि पत्नी ने चिठ्ठी पर आवश्यकता लिखी हो और भगवान ने उसी दिन उसकी व्यवस्था न कर दी हो। आपकी बातें सुनकर तो लगता है कि भगवान को पता होता है कि किस दिन मेरी श्रीमती क्या लिखने वाली हैं अन्यथा आपसे इतने दिन पहले ही सामान ख़रीदना आरम्भ न करवा दिया होता परमात्मा ने। वाह भगवान वाह! तू  महान है तू दयावान है। मैं हैरान हूँ कि वह कैसे अपने रंग दिखाता है।"

वैद्यजी ने आगे कहा, "जब से होश सँभाला है, एक ही पाठ पढ़ा है कि सुबह परमात्मा का आभार करो, शाम को अच्छा दिन गुज़रने का आभार करो, खाते समय उसका आभार करो, सोते समय उसका आभार करो।

Thursday, March 1, 2018

नालायक || Nalayak

(आभार - यह रचना मुझे Whatsapp पर प्राप्‍त हुईप्रेरक लगी तो ब्‍लाग पर पोस्‍ट कर दिया। लेखक का नाम अज्ञात है फिर भी मैं अज्ञात लेखक के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।)

देर रात अचानक ही पिता जी की तबियत बिगड़ गयी। आहट पाते ही उनका नालायक बेटा उनके सामने था। माँ ड्राईवर बुलाने की बात कह रही थीपर उसने सोचा अब इतनी रात को इतना जल्दी ड्राईवर कहाँ आ पायेगा यह कहते हुये उसने सहज जिद और अपने मजबूत कंधो के सहारे बाऊजी को कार में बिठाया और तेज़ी से हॉस्पिटल की ओर भागा। बाउजी दर्द से कराहने के साथ ही उसे डांट भी रहे थे "धीरे चला नालायकएक काम जो इससे ठीक से हो जाए।" नालायक बोला "आप ज्यादा बातें ना करें बाउजीबस तेज़ साँसें लेते रहियेहम हॉस्पिटल पहुँचने वाले हैं।"

अस्पताल पहुँचकर उन्हे डाक्टरों की निगरानी में सौंपवो बाहर चहलकदमी करने लगाबचपन से आज तक अपने लिये वो नालायक ही सुनते आया था। उसने भी कहीं न कहीं अपने मन में यह स्वीकार कर लिया था की उसका नाम ही शायद नालायक ही हैं । तभी तो स्कूल के समय से ही घर के लगभग सब लोग कहते थे की नालायक फिर से फेल हो गया। नालायक को अपने यहाँ कोई चपरासी भी ना रखे।

कोई बेवकूफ ही इस नालायक को अपनी बेटी देगा। शादी होने के बाद भी वक्त बेवक्त सब कहते रहते हैं की इस बेचारी के भाग्य फूटें थे जो इस नालायक के पल्ले पड़ गयी। हाँ बस एक माँ ही हैं जिसने उसके असल नाम को अब तक जीवित रखा हैपर आज अगर उसके बाउजी को कुछ हो गया तो शायद वे भी.. इस ख़याल के आते ही उसकी आँखे छलक गयी और वो उनके लिये हॉस्पिटल में बने एक मंदिर में प्रार्थना में डूब गया। प्रार्थना में शक्ति थी या समस्या मामूलीडाक्टरों ने सुबह सुबह ही बाऊजी को घर जाने की अनुमति दे दी।

घर लौटकर उनके कमरे में छोड़ते हुये बाऊजी एक बार फिर चीखें, "छोड़ नालायक ! तुझे तो लगा होगा कि बूढ़ा अब लौटेगा ही नहीं।" उदास वो उस कमरे से निकलातो माँ  से अब रहा नहीं गया, "इतना सब तो करता हैबावजूद इसके आपके लिये वो नालायक ही है सागर और अभिषेक दोनो अभी तक सोये हुए हैं उन्हें तो अंदाजा तक नही हैं की रात को क्या हुआ होगा ..... बहुओं ने भी शायद उन्हें बताना उचित नही समझा होगा । यह बिना आवाज दिये आ गया और किसी को भी परेशान नही किया भगवान न करे कल को कुछ अनहोनी हो जाती तो और आप हैं की उसे शर्मिंदा करने और डांटने का एक भी मौका नही छोड़ते । कहते कहते माँ रोने लगी थी

इस बार बाऊजी ने आश्चर्य भरी नजरों से उनकी ओर देखा और फिर नज़रें नीची करली। माँ रोते रोते बोल रही थी अरेक्या कमी है हमारे  बेटे में हाँ मानती हूँ पढाई में थोड़ा कमजोर था .... तो क्या क्या सभी होशियार ही होते हैं वो अपना परिवारहम दोनों कोघर-मकानपुश्तैनी कारोबाररिश्तेदार और रिश्तेदारी सब कुछ तो बखूबी सम्भाल रहा है जबकि  बाकी दोनों जिन्हें आप लायक समझते हैं वो बेटे सिर्फ अपने बीबी और बच्चों के अलावा ज्यादा से ज्यादा अपने ससुराल का ध्यान रखते हैं । कभी पुछा आपसे की आपकी तबियत कैसी हैं और आप हैं की ....

बाऊजी बोले संगीता तुम भी मेरी भावना नही समझ पाई मेरे शब्द ही पकड़े न क्या तुझे भी यही लगता है कि इतना सब के होने बाद भी  इसे बेटा कह के नहीं बुला पाने कागले से नहीं लगा पाने का दुःख तो मुझे नही है क्या मेरा दिल पत्थर का है हाँ संगीता सच कहूँ दुःख तो मुझे भी होता ही हैपर उससे भी अधिक डर लगता है कि कहीं ये भी उनकी ही तरह लायक ना बन जाये। इसलिए मैं इसे इसकी पूर्णताः का अहसास इसे अपने जीते जी तो कभी नही होने दूगाँ ....
  
माँ चौंक गई ..... ये क्या कह रहे हैं आप हाँ संगीता ...यही सच है अब तुम चाहो तो इसे मेरा स्वार्थ ही कह लो। कहते हुये उन्होंने रोते हुए नजरे नीची किये हुए अपने हाथ माँ की तरफ जोड़ दिये जिसे माँ ने झट से अपनी हथेलियों में भर लिया। और कहा अरे ...अरे ये आप क्या कर रहे हैं  मुझे क्यो पाप का भागी बना रहे हैं । मेरी ही गलती है मैं आपको इतने वर्षों में भी पूरी तरह नही समझ पाई ......
  
और दूसरी ओर दरवाज़े पर वह नालायक खड़ा खड़ा यह सारी बातचीत सुन रहा था वो भी आंसुओं में तरबतर हो गया था। उसके मन में आया की दौड़ कर अपने बाऊजी के गले से लग जाये पर ऐसा करते ही उसके बाऊजी झेंप जातेयह सोच कर वो अपने कमरे की ओर दौड़ गया। कमरे तक पहुँचा भी नही था की बाऊजी की आवाज कानों में पड़ी . अरे नालायक .....वो दवाईयाँ कहा रख दी  गाड़ी में ही छोड़ दी क्या कितना भी समझा दो इससे एक काम भी ठीक से नही होता .... नालायक झट पट आँसू पौछते हुये गाड़ी से दवाईयाँ निकाल कर बाऊजी के कमरे की तरफ दौड़ गया ।

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