Tuesday, October 25, 2011

अपने गुरुजनों को सादर समर्पित



गुरुजन अपने कितने प्यारे,
ब्रह्मा विष्णु शिवा हमारे,
खुद जलकर जीना सिखलाते,
जीवन राह दिखाने वाले,
मात पिता और सखा हमारे
गुरुजन अपने कितने प्यारे।

गुरु बिन ज्ञान नहीं मिलता रे,
ग्रन्थ पड़े रहते हैं सारे,
गुरु हमारे ज्ञान दीप हैं,
अन्धकार काटे हैं सारे।

सारे वन की कलम बनाकर,
सागर जल को बना के स्याही,
धरती को कागज करके भी,
गुरुगुन लिखते दुनिया हारी।

Sunday, April 10, 2011

मन की व्यथा



मन की व्यथा कहूं मैं किससे, कोई न अपना मीत यहां।
मन पंछी पिंजड़े के भीतर, इसे सुकूं अब मिले कहां।

मीठे फल के फेर में पड़ के, कर बैठा बस इतनी भूल।
समझ न पाया इस दुनिया को, यहां तो सब है सेमल फूल।

जब आया पिंजड़े के भीतर, आजादी को तब जाना।
जेल की चुपड़ी रोटी से, अच्छा है भूखे मर जाना।

एक बार का मरना अच्छा, आजादी का वरण करो।
पराधीन सपनेहुं सुख नाही, आज इसे स्मरण करो।

मानव बन मानव का बैरी, दिल पर चोट बहुत है करता।
यही सोच मैं बैठा हूं के, ऊपर वाला न्याय है करता।

सरी चोट सहूंगा दिल पे, घाव एक न दिखलाऊंगा।
मलिक तू सब देख रहा है, और किसी से न गाऊंगा।

ईश्वर तेरी लाठी में आवाज नहीं पर चोट बड़ी है।
इंतजार मैं करूंगा स्वामी, विषम घड़ी अब आन पड़ी है।

चित्र marypages.com से साभार

Thursday, January 13, 2011

एक दूजे के लिए हम बने थे नहीं


एक दूजे के लिए हम बने थे नहीं,
फिर भी प्यारा हमारा ये साथ रहा।
खुशियां बांटी हैं जीवन की मिलके सभी,
और दुख में भी तुम्हारा साथ रहा।

ये पता था हमें मिल सकेंगे नही,
फिर भी प्यारा सा इक एहसास रहा।
कच्ची डोरी से हम तुम बंधे ही नहीं
फिर भी बंधन का इक एहसास रहा।

दिल के रिश्ते हैं जो खुद ही जुड़ जाते हैं,
किसी बंधन का इनमें न भास रहा।
प्यार की डोर होती है पावन बड़ी,
इसकी मर्यादा का हमको भास रहा।

यादें दिल में बसी हैं रहेंगी सदा,
चाह कर भी न इनको भुला पाउंगा।
है यहीं मुझको ऐ मेरे प्यारे सनम,
होगे तनहाई में तो मैं याद आऊंगा।

जिन्दगी का सफर है ये लम्बा मगर
प्यार की यादों में ही गुजर जायेगा।
खुश रहो मेरे हमदम ओ मेरे सनम
दिल दुआ देगा हरदम ये दोहरायेगा।

Tuesday, October 5, 2010

कितना प्यार मुझे है तुमसे कैसे तुमको बतलाऊं


कितना प्यार मुझे है तुमसे कैसे तुमको बतलाऊं
हनूमान मैं नहीं प्रिये जो चीर कलेजा दिखलाऊं।

तुमको याद किया करता हूं मैं प्रतिपल आंहें भरता हूं
यकीं दिलाऊ कैसे तुमको प्यार बहुत मैं करता हूं।

होती जब भी बात तुम्हारी छुप-छुप कर मैं सुनता हूं
ना देखूं मैं जिस दिन तुमको पागल सा मैं लगता हूं।

प्रीत की रीत निभाऊं कैसे, मुझे नहीं है कुछ आता
बिन देखे अब चैन नहीं है, काश मैं तुमसे कह पाता।

आंखें तेरी हुई दिवानी, नहीं इन्हें हैं कुछ भाता
हर पल चाहें सूरत तेरी, दूजा कुछ भी नहीं सुहाता।

दिन में खोया-खोया रहता, नींद न आती रातों में
भरी चूड़ियां हरदम दिखतीं, मेंहदी वाले हाथों में।

हर आहट पे चौक मैं पड़ता मिलता मुझको आभास तेरा
दिल में उठती घोर निराशा जब न मिलता साथ तेरा।

खत मैंने हैं बहुत लिखे पर एक न तुमको भेज सका
डर लगता है पढ कर इनको, हो न जाओ कहीं खफा।

मैं देखूंगा बाट तुम्हारी, किया इरादा पक्का है
तुम भी मुझसे प्यार करोगी, प्यार मेरा गर सच्चा है।

चित्र  chennai.olx.in से साभार 

Thursday, September 30, 2010

मैं बापू से मिलकर आया

बापू और कस्तूरबा सेवाग्राम आश्रम में
विगत 16 सितम्बर 2010 को मुझे सेवाग्राम आश्रम वर्धा महाराष्ट्र जाने का सुयोग प्राप्त हुआ। मैं अपने को बड़ा भाग्यशाली समझता हूं कि मुझे बापू की कर्मस्थली सेवाग्राम में जाने का अवसर मिला। वहां पहुंच कर ऐसी आत्मीय शांति की अनुभूति हुई कि उसका वर्णन करने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है उसके विषय में केवल इतना कहना ही पर्याप्त है कि 'ज्यो गूंगे मीठे फल को रस अन्तर्गत ही भावे' वही स्थिति मेरी है। वहा पर मैं तो केवल इसलिए गया कि सेवाग्राम आया हूं तो बापू का आश्रम भी घूम ही लेता हूं। लेकिन वहां जाकर पता चला कि यह तो एक परम पावन तीर्थ है जहां प्रत्येक भारतवासी या जो सत्य की तलाश करना चाहते हैं उन्हें कम से कम एक बार तो अवश्य ही आना चाहिए। वहां जाने से पहले मैं बापू को गांधी जी कहता था लेकिन वहां जाकर पता चला कि वे गांधीजी नही थे वरन बापू ही थे। मुझे लगता है कि वहां जाकर मुझे बापू का साक्षात्कार हो गया है हो सकता है ऐसा कुछ न हुआ हो या यह मेरे दिमाग  में हुए किसी 'केमिकल लोचा' का परिणाम हो। चाहे जो हो मैं वहां पहुंचकर अपने को धन्य समझता हूं। और मैंने पहली बार बापू को इतने करीब से देखा और जाना। मुझे दुख है कि हमारी शैक्षिक संस्थाएं बच्चों को ऐसे स्थानों पर क्यों भ्रमण नहीं करवाती जहां पर उन्हें सत्य का साक्षात्कार स्वतः ही हो सकता है।  मुझे इस बात का भी दुख है कि मैं अब तक इस महापुरुष से इतना अपरिचित कैसे रहा जिसका दुनिया लोहा मानती है। शायद इसका कारण घर की मुर्गी दाल बराबर होना हो। तमाम मलाल, दुख, हर्ष, पश्चाताप और न जाने किन-किन भावों के साथ बापू को समर्पित मेरी कुछ पंक्तियां आपके सम्मुख प्रस्तुत हैं :-


मैं बापू से मिलकर आया, सेवाग्राम के आश्रम में।
देख मुझे वे बहुत खुशी थे, लेकिन हलचल थी मन में।
पास बैठ जब मैंने देखा, दुखी बहुत थे अन्तर्मन में॥

मैंने पूछा बात क्या बापू, कुछ मुझको बतलाओ तो,
ऐसी भूल हुई क्या बापू राह मुझे दिखलाओ तो।
पहले बापू मुस्काए फिर बाले ऐ वत्स मेरे -
प्रयोग पड़ा है अभी अधूरा सत्य पहेली सुलझे ना।
देख रहा मैं बच्चे मेरे सत्य राह से भटके ना।
पहले राह सरल थी लेकिन अब है दुविधा आन पड़ी।
झूठ ने पहना 'सत्य मुखौटा', बनी मुसीबत राह खड़ी।
बच्चे मेरे भटक न जायें, सोच-सोच घबराता हूं।
यही व्यथा मेरे अन्तर्मन में, कोई राह न पाता हूं।

मैं बोला अब बापू मेरे संशय अपना दूर करो।
हृदय 'दिया' है मेरा बापू, इसे तुरत स्वीकार करो।
जोत जला दो इसमें ऐसी प्रतिपल ही मैं जलता जाऊं।
खुद जलकर के इस जग में मैं सत्य पथिक को राह दिखाऊं॥
सत्य पथिक को राह दिखाऊ॥

चित्र ruraluniv.ac.in से साभार

Monday, September 27, 2010

भगवन तू है बहुत महान

मां विरासनी देवी बिरसिंहपुर पाली उमरिया म०प्र०


भगवन तू है बहुत महान,
देता रहता सबको ज्ञान।
अज्ञानी हम समझ न पाते,
करते हैं झूठा अभिमान॥

मन के भीतर तेरा धाम,
देख रहा तू सबके काम।
बुरे काम करते जब भी हम,
मन तो हमको रोके हर-दम॥

फिर भी तुझको हम झुठलाते,
अन्तकाल बैठ पछताते॥

अनन्त नाम हैं तेरे स्वामी,
क्या जानें हम मूरख खल-कामी।
जिसने मन से तुम्हें पुकारा,
हुआ है उसका वारा न्यारा॥

आया हूं अब शरण तुम्हारी,
मुझ पर कृपा करो दुखहारी।
नित्य सत्य के मार्ग चलूं मैं
अभिमानों से बचा रहूं मैं॥

करूं राष्ट्र की सेवा इतनी,
'जगद्‌गुरु' का पद दिलवाऊं।

मार्ग कठिन है अन्धकारमय,
ज्ञान ज्योति दो मन के भीतर।
जगत के आऊं काम प्रभू मैं,
भीतर-बाहर हो प्रकाशमय॥

Friday, September 24, 2010

कहां गया वह प्यार तुम्हारा


कहां गया वह प्यार तुम्हारा
जिस पर मैंने सब कुछ वारा
छीन लिया है दिल का सहारा
फिरता हूं मैं मारा मारा
कहां गया वह प्यार तुम्हारा॥

कहां गयी वो प्यार की बातें
प्यार और टकरार की बातें
प्यार-प्यार में धर्म की बातें
धर्म और दर्शन की बातें
प्रेम, काम और मोक्ष की बातें
बातों में बातों की बातें
बातों में कटती थी रातें
कहते थे सब आते जाते
जाने क्या करते ये बातें ?

'हे मेरी तुम'
प्यार नहीं है सांप की केचुल
जो छोड़ा और भूल गये
क्यों तुम मुझको भूल गयी ?
क्या तुम सचमुच में भूल गयी ?

हां तुम मुझको भूल गयी
पर...
मैं न तूमको भूल सका।
मैं न तुमको भूल सका॥

चित्र japaninc.com से साभार

मुझको कविता नहीं है आती


मुझको कविता नहीं है आती
मैं तो केवल लिखता पाती।

जो कुछ मेरे मन में आता
जो कुछ मेरे मन को भाता
जो है मेरी थाती
मैं तो केवल लिखता पाती।

रस छन्द औ अलंकार का ज्ञान नहीं है
कितनी मात्रा कहां लगेगी
भान नहीं है
जो कुछ भी आ जाता मन में,
लिख देता हूं।
इसी से अपने पागल मन को
बहला लेता हूं।
यह कहने में मुझको देखो
शर्म तनिक न आती
मुझको कविता नहीं है आती
मैं तो केवल लिखता पाती॥

चित्र communities.canada.com से साभार

Thursday, September 23, 2010

कैसा है यह सतीत्व तेरा






एक पति है मन के भीतर, एक है तेरा घरवाला।


प्रीत की रीत निभाई किससे, भड़काई उर अन्तरज्वाला॥
आज बनी है वधू किसी की, बैठी है वो ओढ  दुशाला॥


पति तो केवल एक ही होता, मन से वरण किया है जिसका।
बाकी सब है दुनियादारी, कौन हुआ है यहां पे किसका॥


प्रीत की डोर बहुत नाजुक है, ऐसे इससे मत खेलो।
डोर के टूटे दिल टूटेगा, दो-दो दिल से ना खेलो॥


सच का सामना कठिन है फिर भी, झूठ बोलना नहीं सरल।
कुछ करने से पहले सोचो, आगे फिर क्या होगा कल॥


प्रेम नहीं है सांप की केचुल, छोड  दिया और भूल गये।
जीवन भर तड पोगे तुम भी, कभी न तुमको आये कल॥


तोड  दिया दिल मेरा तुमने, बाप की आन बचाने को।
पोत दी मेरे मुख पे कालिख, मैं क्या बतलाऊं जमाने को॥


जिसके गर्व बहुत करता था, आज वो मुझसे हुई जुदा।
प्रीत निभाई ठोकर खाई, कैसी किस्मत मिली खुदा॥


कसम खुदा की मैं कहता हूं, मुझको भूल न पाओगे।
बेशक संग सजन के होगे, मन में हमें ही पाओगे॥


जब आयेगी हिचकी तुमको, भ्रम मत करना साजन का।
जब तक नाम न मेरा लोगे, छुटकारा न पाओगे॥


दिल के टूटे शोर न होता, पर दर्द बहुत ही होता है।
दुनिया जब है जश्न मनाती, ये अन्दर-अन्दर रोता है॥


चित्र  


topnews.in 


से साभार

हाय रे किस्मत खोटी मेरी


हाय रे किस्मत खोटी मेरी, प्रियतम मेरा रूठ गया।
प्रेम का कच्चा धागा था जो, एक पल में ही टूट गया॥

प्रियतम मेरा गया वहां पे, जहां से कोई लौटे ना।
ऐसी सजा मिली है मुझको, अब तो पल-पल मुझको खटना॥

जनम-जनम तक साथ का वादा, कहां गया ऐ प्रीत मेरे।
मन की बातें मन में ठहरीं, किसे सुनाऊं गीत मेरे॥

तेरी भी गलती क्या यारा, रब ही जब हो गया खफा।
प्रेम तो होता अक्स खुदा का, फिर कैसे कर दिया जुदा॥

गलती तो कुछ हुई है मुझसे, जो मुझको मिल रही सजा।
कष्ट दिया था औरों को और जीवन का था लिया मजा॥

जुर्म कुबूल मुझे हैं सारे, काटी मैंने बड़ी सजा।
यही गुजारिश अब है मौला, मुझको अपने पास बुला॥

नहीं सहा जाता अब मुझसे, प्रियतम का यह दुख बड़ा।
मुझको अपने पास बुला ले, तेरा दिल है बहुत बड़ा।

चित्र dorsetwebdesigns.com से साभार

Sunday, September 5, 2010

तुम्हीं से प्यार करता था, तुम्हीं को प्यार करता हूं।


तन्हा हो के भी मैं कभी तन्हा नहीं होता,
लम्हा कौन सा ऐसा के मेरा दिल नहीं रोता॥

तुम्हारी याद आती है औ पलकें भीग जाती हैं,
रहूं महफिल या वीरां में उदासी छा ही जाती है॥

कहूं किससे मैं हाले दिल, यहां अपना नहीं कोई,
जिसे अपना समझता हूं वो मुझको छोड़ जाते हैं॥

ये जालिम इश्क है कैसा, सबब इसका यही होता,
जिसे हम प्यार करते हैं, वो हमको भूल जाता है॥

तमन्ना है यही दिल में के जब होऊं मैं कफन ओढ़े,
जनाजे में वो आ कर के, दामन को भिगो जाये॥

निशानी कुछ नही मेरी, कहानी कुछ नहीं मेरी,
सिले हैं होठ भी मैंने, निगाहें बन्द करता हूं॥

जनाजे पे चली आना, यही फरियाद करता हूं।
नहीं खवाहिश बची कुछ भी, तुम्हीं को याद करता हूं।
तुम्हीं से प्यार करता था, तुम्हीं को प्यार करता हूं।


चित्र  dreamformypeople.blogspot.com से साभार।

Saturday, August 14, 2010

मत आओ अब सपने मे


क्यों आते हो सपनों में, जब हमको तनहा छोड़ दिया।
प्रेम की कच्ची डोरी को, एक पल में झट से तोड  दिया॥

देख लिया है प्यार तुम्हारा, अब नहीं धोखा खाऊंगा।
जब आओगे सपने में, मैं फौरन ही जग जाऊगा॥

सपने झूठे होते हैं, बस झूठी तस्वीर दिखाते हैं।
नहीं हो सकता संभव जो, वो उसको कर दिखलाते हैं॥

वाह री किस्मत मेरी, मैंने अब तक धोखा खाया है।
इस दुनिया में जिसको चाहा, उससे ही दुख पाया है॥

यही सबब है प्यार का यारों, यार नहीं मिल पाताहै।
बस मिलती है उसकी यादें, जीवन भर तड पाती हैं॥

आते हैं सुख सपने इतने, जीवन की राह भुलाते हैं।
यही हुआ है जगत में हरदम, प्रेमी मिल नहीं पाते हैं॥

शिकवा नहीं गुजारिश तुमसे, मत आओ अब सपने में।
बेगाना कर छोड  दिया जब, मत गिनवाओ अपने में।

मत आओ अब सपने में, मत आओ अब सपने में॥

Tuesday, December 29, 2009

सरकारी क्षेत्र के असरकारी कर्मचारी- भाग-२


आज के समय में सरकारी क्षेत्र के अ-सरकारी कर्मचारियों की संख्या में काफी इजाफा हो गया है और समय के साथ-साथ यह संख्या बढ़ती ही जा रही है। इन अ-सरकारी कर्मचारियों की संख्या बढ़ने का एक और कारण देश में व्याप्त होता भ्रष्टाचार भी है जिसके चलते अधिकारी वर्ग अपने पद की प्रतिष्ठा और गरिमा बचा पाने में असमर्थ प्रतीत हो रहे हैं इसका परिणाम यह होता है कि उनके अन्दर सत्य की शक्ति का अभाव होने के कारण वे अपने अधीनस्थों को किसी गलत काम को करने न तो रोक ही पाते हैं और न ही उन पर प्रभावी नियंत्रण ही रख पाते हैं। ऐसी स्थिति में अधिकारी बनाम कर्मचारी का युद्ध सदैव चलता रहता है। इस युद्ध की स्थिति में अधिकारी अपना एक विश्वासपात्र अ-सरकारी कर्मचारी नियुक्त कर लेता है और उससे वे सब सरकारी काम करवाता है जो कि उसे लगता है कि सरकारी कर्मचारी से करवाने से गोपनीयता भंग हो सकती है। मतलब तो आप समझ ही रहे होंगे।
कुछ-कुछ विभागों में तो यह देखा गया है कि अधिकारी अ-सरकारी कर्मचारी को नियुक्त करने को एक स्टेटस सिम्बल के रूप में देखते हैं। जैसे ही वे किसी कार्यालय में पहुंचते हैं वहां की अव्यवस्थाओं से खिन्नता जाहिर करते हुए अपने किसी अ-सरकारी आदमी को नियुक्त कर लेते हैं। सामान्यतया ये अ-सरकारी कर्मचारी उनके अति विश्वासपात्र होते हैं जिनके बलबूते वे अपनी सत्ता चलाते हैं।
कहीं-कहीं अधिकारी वर्ग इन अ-सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति मजबूरी में भी करते हैं। कई ऐसे कार्यालय भी हैं जहां विभागाध्यक्षों की लापरवाही, लोभ, सत्तालोलुपता, भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता के कारण अधिकारी-कर्मचारी सम्बन्धों पर बड़ा प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। ऐसे कार्यालयों में अधिकारी कर्मचारी के नियंत्रण में नहीं रहना चाहते हैं। ऐसे में अधिकारियों को तब बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है जब उन्हें समयान्तर्गत किसी कार्य को पूर्ण करना हो या समय से कोई सूचना शासन को पहुंचानी हो। ऐसे अवसरों पर अधिकारियों को कर्मचारियों की बड़ी अनुनय-विनय करते देखा जा सकता है क्योंकि शासन की बैठकों में अधिकारी को ही उपस्थित होना होता है। इन विपरीत परिस्थितियों में ये अ-सरकारी कर्मचारी बड़े काम के मोहरे साबित होते हैं। अ-सरकारी कर्मचारी सरकारी कर्मचारियों की तुलना में सामान्यतया अधिक योग, कुशल, दक्ष एवं प्रशिक्षत होते हैं। सरकारी कर्मचारियों की तुलना में इनमें केवल अनुभव की कमी होती है जो कि धीरे-धीरे एक-दो साल में ये ग्रहण कर लेते हैं। कहीं-कहीं तो यह भी देखा गया है कि ये अ-सरकारी कर्मचारी सरकारी कर्मचारियों से भी ज्यादा असरकारी यानी कि प्रभावशाली स्थान बना चुके हैं। कई विभाग तो ऐसे हैं जहां का अधिकतम काम इन अ-सरकारी कर्मचारियों के भरोसे ही हो रहा है। अ-सरकारी कर्मचारियों की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता है।
ऐसा कहना सत्य नहीं होगा कि अ-सरकारी कर्मचारी केवल सरकारी धन के दुर्विनियोग के प्रयोजन से नियुक्त किये जाते हैं। बल्कि सत्य तो यह है कि इनकी नियुक्ति समय की जरूरत है और इससे सिस्टम को एक नया रूप मिला है। यदि सरकार इन अ-सरकारी कर्मचारियों पर कोई अध्ययन कराये तो उसे देश एवं प्रदेश में व्याप्त एक बहुत बड़ी समस्या और उसका समाधान ये अ-सरकारी कर्मचारी मुहैया करा सकते हैं। सरकार जनता की सेवा के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति करती है और जनता की हमेशा यह शिकायत रहती है कि कर्मचारी सही से काम नहीं करते। किन्तु जहां-जहां ये अ-सरकारी कर्मचारी नियुक्त हुए हैं वहां व्यवस्था में कुछ न कुछ परिवर्तन अवश्य आया है जिसे हम इन अ-सरकारी कर्मचारियों की उपयोगिता के रूप में रेखांकित कर सकते हैंे। अ-सरकारी कर्मचारियों की कुछ उपयोगिता या व्यवस्था में उनके योगदान को निम्नलिखित रूप में देखा जा सकता है-
१. सामान्यतया यह देखा गया है कि एक अ-सरकारी कर्मचारी सरकारी कर्मचारी की तुलना में अधिक निष्ठा, कार्यकुशलता, लगन, मेहनत एवं ईमानदारी से काम करता है। इसका कारण स्पष्ट है कि उसे यह पता होता है उसकी यह काबिलियत ही उसे किसी सरकारी कार्यालय में स्थापित बनाये रख सकती है। यही वह एक चीज की कमी इस कार्यालय में थी जिसकी पूर्ति के लिए उसे लाया गया है और सबसे बड़ी बात यह कि यदि उसने इन मानकों का पालन नहीं किया तो किसी भी समय उसे उसकी सेवाओं से हटाया जा सकता है। तो क्या इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि सरकारी कर्मचारियों के कथित निकम्मेपन का कारण उनकी सेवाओं की स्थायी प्रकृति का होना है? २. सीमित साधनों में अधिकतम उत्पादकता का प्रयास - अ-सरकारी कर्मचारियों में यह गुण पाया जाता है कि वे व्यवस्था में व्याप्त कमियों के कारण न-नुकुर न करके केवल काम पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं। वे विषम से विषम परिस्थितियों में काम करने को तत्पर रहते हैं। क्योंकि उनके मन में कहीं न कहीं यह बात जरूर होती है कि मुझे अपने काम से मतलब है न कि पूरे कार्यालय की व्यवस्था से। ३. दुष्प्रेरकों से प्रभावित न होना - मेरे हिसाब से हर वह व्यक्ति जो अपने प्रभाव से किसी कर्मचारी को उसके सामान्य कार्य से बहकाये वह दुष्प्रेरक है। सामान्यतया अ-सरकारी कर्मचारी दुष्प्रेरकों के प्रभाव से रहित होते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी नियुक्ति और पदच्युति में इन कथित दुष्प्रेरकों की कोई भूमिका नहीं रहती है। ४. कार्यों को अधिक कुशल सम्पादन - अ-सरकारी कर्मचारी सरकारी कार्यालय के किसी कार्य पर अपना अधिपत्य नहीं समझता और यही कारण है कि वह किसी काम को लटकाये नहीं रखना चाहता। इसका परिणाम यह होता है कि कार्य निर्बाध गति से अनवरत चलता रहता है। ५. अ-सरकारी कर्मचारी कम खर्चीले होते हैं- जहां एक सरकारी कर्मचारी को पन्द्रह से बीस हजार रूपये तनख्वाह पर रखकर भी कार्य करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता वहीं अ-सरकारी कर्मचारी महज तीन से छ: हजार में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। सरकारी कर्मचारी की तुलना में अधिक कुशलता से कार्य का निष्पादन करते हैं और इनका मनमाना उपयोग भी किया जा सकता है। सस्ता भी बढ़िया भी। ६. नियुक्ति प्राधिकारी के प्रति पूर्ण निष्ठा - अ-सरकारी कर्मचारी अपने नियुक्ति प्राधिकारी के प्रति पूर्ण निष्ठावान पाये जाते हैं। यही कारण है कि ये अन्य अधिकारियों का प्रभावशाली कर्मचारियों के दबाव में नहीं आते हैं। ये न तो किसी आन्तरिक न तो किसी वाह्य अधिकारी के ही दबाव में आते हैं। इस कारण से भी कार्य को कुशल सम्पादन अनवरत गति से चलता रहता है। ७. यूनियनों और कर्मचारी संगठनों से प्रभावित नहीं होते - चंूकि ये अ-सरकारी कर्मचारी किसी यूनियन अथवा कर्मचारी संगठन के सदस्य नहीं होते हैं इसलिए ये इन संगठनों और यूनियनों के प्रस्तावों के द्वारा भी प्रभावित नहीं होते हैं। ८. समय की बचत - अ-सरकारी कर्मचारी अपने पास किसी काम को अधिक समय तक लम्बित नहीं रखना चाहते और यदि कोई जटिल समस्या उनके सामने आती है तो वे उस समय तकनीकी का अधिकतम उपयोग कर उसे सरलतम रूप में परिवर्तित कर लेते हैं। वे किसी सरकारी ढर्रे पर चलने के आदी नहीं होते हैं।
अ-सरकारी कर्मचारियों से केवल लाभ ही होता हो, ऐसा नहीं है। इनके द्वारा विभागों को कुछ हानियां भी हैं। अ-सरकारी कर्मचारियों की सामाजिक और आर्थिक जिन्दगी से हम आगे की पोस्टों में परिचित होंगे।

Saturday, December 26, 2009

सरकारी क्षेत्र के असरकारी कर्मचारी...........



   एक समय हुआ करता था जब कि हम किसी से परिचय प्राप्त करते समय उससे पूंछा करते थे कि आप किस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं तो उसके जवाब के लिए उसके पास केवल दो विकल्प ही होते थे या तो वह कहता था कि वह सरकारी क्षेत्र में काम करता है या कहता था कि प्राइवेट सेक्टर में काम करता है। परन्तु आज के तकनीकी युग में जिस प्रकार से नयी-नयी तकनीकियों का आविष्कार हो रहा है उसी तरह से इन क्षेत्रों में भी एक नये क्षेत्र का भी उद्भव पिछले कुछ वषों में हुआ है, और उस नये क्षेत्र के कर्मचारी हैं- सरकारी क्षेत्र के असरकारी कर्मचारी। चौंकिये नहीं! यह असरकारी शब्द सरकारी क्षेत्र के प्रभावशाली कर्मचारियों की श्रेणी नहीं है बल्कि यह उन कर्मचारियों की श्रेणी है जो अ-सरकारी हैं और सरकारी क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। 
  जिन लोगों का सरकारी कार्यालयों से दूर-दूर तक नाता नहीं होगा उन्हें शायद मेरी बात पर आश्चर्य भी हो रहा होगा कि वास्तव में कर्मचारियों की ऐसी भी श्रेणी हो सकती है, लेकिन वे लोग जो सरकारी कार्यालयों से सम्बन्धित हैं वे इन नयी श्रेणी के कर्मचारियों से भली-भांति परिचित होंगे। असरकारी कर्मचारी जैसा कि इनके नाम से ही पता चलता है कि ये सरकारी नहीं होते अत: इनकी नियुक्ति, उपस्थिति, भुगतान, कार्य की शर्तें आदि किसी सरकारी कागज पर लिखित रूप में नहीं होती हैं वरन् इन्हें आपसी समझ-बूझ के आधार पर नियुक्त कर लिया जाता है, और ये नियोक्ता के प्रसाद पर्यन्त अपनी सेवाएं प्रदान करते रहते हैं। 
  अब प्रश्न यह उठता है कि जब सरकारी क्षेत्र में कर्मचारियों की संख्या इतनी अधिक है कि सरकार को समय से वेतन देने में भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है तो फिर इस तरह के कर्मचारियों का क्या औचित्य। इन असरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति के कारणों के रूप में आज की तकनीकी और खास-तौर पर कम्प्यूटर को दोष दिया जा रहा है।  
 सरकार ने असरकारी क्षेत्र को देखते हुए विचार किया कि यदि सरकारी कार्यालयों में कम्प्यूटर मुहैया करा दिया जाय तो ई-गवर्नमेंट की राह आसान हो जायेगी और सरकारी कामकाज के ढर्रे में भी सुधार आयेगा तथा समय से सूचनाएं शासन के पास उपलब्ध रहेंगी। बस सरकार ने आव देखा न ताव धड़ाधड़ कम्प्यूटर खरीदे जाने लगे और सरकारी कार्यालयों में स्थापित किये जाने लगे। लेकिन सरकार से यहीं चूक हो गयी। सरकार सरकारी कर्मचारियों को या तो प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं करा सकी, या तो प्रशिक्षण केवल कागजों पर ही संचालित होते रहे, या तो प्रभावी नियंत्रण के अभाव के कारण कर्मचारियों ने प्रशिक्षण में कोई रूचि नहीं ली। फलस्वरूप कर्मचारियों को प्रमाणपत्र तो मिल गया और उस प्रमाणपत्र के साथ उन्हें मिलने वाला टंकण भत्ता अब कम्प्यूटर भत्ता में भी बदल गया किन्तु वे आज भी अपने को कप्यूटर निरक्षर ही बताते हैं। फलस्वरूप कम्प्यूटर या तो डिब्बे में ही बन्द रहे, या अधिकारियों के बच्चों के लिए उनके घरों में चोरी छिपे स्थापित कर दिये गये या फिर जरूरत महसूस की जाने लगी कि किसी असरकारी व्यक्ति की सेवाएं ली जाएं।
   असरकारी कर्मचारियों की उत्पत्ति में यह मान लिया जाय कि सरकारी कर्मचारियों ने कम्प्यूटर प्रशिक्षण नहीं लिया इसलिए असरकारी कर्मचारी इस क्षेत्र में आये तो यह भी पूर्णतया सत्य नहीं है। आजकल विभागों में विभागाध्यक्षों में सत्य की शक्ति न होने के कारण उनका अधीनस्थों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रहा। उसका परिणाम यह हुआ कि आज के विभागाध्यक्ष अपने अधीनस्थों को कड़ाई से कम्प्यूटर के प्रयोग के लिए बाध्य नहीं कर सके। प्रभावी नियंत्रण का अभाव न होने के कारण वे सरकारी कर्मचारी जो कम्प्यूटर के प्रति खासा उत्साहित थे अन्तत: वे हार गये और उन्होंने धीरे धीरे अपने को तकनीकी निरक्षर साबित करने में ही भलाई समझी। आप सोच रहे होंगे कि जो व्यक्ति एक बार कम्प्यूटर पर काम कर ले वह कम्प्यूटर के मोह से कैसे बच सकता है, यानि कि वह अपने को कम्प्यूटर निरक्षर भला क्यों कर साबित करेगा। इसका कारण मैं आपको समझाता हूं। श्रीमान क जो कि एक सरकारी कर्मचारी हैं, ने अपने अन्य सहयोगियों के साथ ही कम्प्यूटर प्रशिक्षण प्राप्त किया, चूंकि वे कम्प्यूटर के आने से व्यवस्था में होने वाले बदलाव के प्रति खासे उत्साहित थे इसलिए उन्होंने प्रशिक्षण को बड़ी निष्ठा व लगन से पूर्ण किया। प्रशिक्षण के बाद श्रीमान क ने अपना कार्यालयीय काम कम्प्यूटर पर करना प्रारम्भ कर दिया जबकि उनके अन्य साथी कर्मचारी या तो कम्प्यूटर पर गेम खेलते या इस तलाश में रहते कि श्रीमान क थोड़ा सा खाली हों तो उनका काम भी निपटा दें। शुरू में श्रीमान क ने यह सोचते हुए कि ये कम सीख पाये हैं इसलिए मदद करने की भावना से उनके कामों को निपटाते रहे। धीरे-धीरे उनके साथी कर्मचारियों ने श्रीमान क के इस नेक इरादे का फायदा उठाते हुए, इसे अपना हक समझ लिया। अब श्रीमान क की स्थिति यह हो चुकी थी कि उनके अन्य साथी उनके अधिकारी के समान उन्हें काम सौंप कर चाय पीने चले जाते और श्रीमान क घण्टों बैठकर दूसरों के काम निपटाते। यह स्थिति बहुत ही निराश करने वाली होती है कि आप जिस व्यक्ति के लिए परेशान हो रहे हों वह कहीं बाहर जाकर चाय पी रहा हो या कस्टमर सेट कर रहा हो। अन्तत: श्रीमान क ने इस तरह काम करने से हाथ खड़े कर लिये। साथी कर्मचारी जो कि पहले बड़ी मीठी-मीठी बातें किया करते थे अब उन्हें घमण्डी, लोभी और न जाने किन-किन सम्बोधनों से सम्बोधित करने लगे। अगर बात यहीं तक सीमित होती तब भी गनीमत थी। श्रीमान क के अपने काम तक ही सीमित रह जाने के कारण या अतिव्यस्तता के कारण अन्य साथी कर्मचारियों के कार्य में बाधा पहुंचने लगी। जब अधिकारी ने सम्बन्धित को फटकार लगाई तो उनसे अपने आप को निर्दोष बताते हुए कहा कि साहब क्या करें श्रीमान क कुछ काम हीं नहीं करना चाह रहे हैं हमेशा फाइलें लटकाये रखते हैं न जाने क्या चाहते हैं? ऐसी शिकायत कई लोगों से मिलने के बाद एक दिन श्रीमान क को अधिकारी के सामने पेश किया गया और उस दिन अधिकारी के द्वारा उनके कम्प्यूटर प्रशिक्षण और उनके कम्प्यूटर के प्रति उत्साह का जो परिणाम मिला कि श्रीमान क ने अपने को कम्प्यूटर निरक्षर मान लेने में ही भलाई समझी। अधिकारी के द्वारा साथी कर्मचारियों को कम्प्यूटर पर कार्य करने के लिए बाध्य करने के बजाय श्रीमान क को फटकार लगाना क्या उचित है? क्या यह श्रीमान क के काम के प्रति निष्ठा को प्रभावित नहीं करता? यह कहां तक उचित है कि श्रीमान क को केवल इस बात के दण्डस्वरूप कि वे कम्प्यूटर साक्षर हैं और कुशल कम्प्यूटर संचालक हैं, वे अपने काम के साथ साथ अन्य साथी कर्मचारियों का काम भी अकेले ही करें? बेहतर तो तब होता जब अधिकारी अन्य साथियों से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए कह देता। कुछ वर्ष पहले जब बैंकों का कम्प्यूटरीकृत हुआ था तो बहुत से कर्मचारी ऐसे थे जो कि कुछ ही वर्षों में सेवानिवृत्त होने वाले थे वे नये सिस्टम में काम नहीं करना चाहते थे लेकिन बैंक ने क्या किया? या तो काम करो या तो सेवानिवृत्ति ले लो। बस फिर क्या था सारे कर्मचारी कम्प्यूटर पर काम करने लगे और आज कर्मचारी भी नयी तकनीकी के प्रयोग से खुश है और ग्राहक भी संतुष्ट हैं। देश को कोषागारों का कम्प्यूटरीकृत किया जाना अपने-आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है और प्रभावी नियंत्रण का एक नायाब नमूना भी। साथी ही यह उनके सवालों का भी जवाब है जो कि कहते हैं कि सरकारी क्षेत्र में नयी व्यवस्थाएं लागू ही नहीं हो सकती।
 इन सरकारी क्षेत्र के असरकारी कर्मचारियों से जुड़ी बहुत सी बातें मेरे मन में आ रही हैं लेकिन उन सबको एक की पोस्ट में डाल देना उचित नहीं प्रतीत हो रहा है। इस पोस्ट में हमने उनके उत्पत्ति के कारणों में से कुछ पर विचार किया। आगे हम उनके उद्भव एवं विकास के साथ साथ उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थितियों पर भी विचार करेंगे।


Tuesday, September 1, 2009

काश कविता मैं भी करता

काश कविता मैं भी करता
अक्षर के मोती चुन-चुनकर, 
सुर के धागे में फिर रचता 
काश कविता मैं भी करता  
कविता रचना है मनभावन 
कविता मन को करती पावन 
कविता में सब भूले तनमन 
कविता है वो जो छू ले मन सबका अन्तर्मन

Saturday, August 1, 2009

अर्धकुम्भ मेला २००७ : कुछ संस्मरण

अर्धकुम्भ मेला २००७ : कुछ संस्मरण
गंगे तव दर्शनात मुक्ति:। सच ही कहा गया है कि जीव गंगा जी के दर्शन करने मात्र से मुक्त हो जाता है। कभी-कभी तो मैं सोचता हूं कि मैं कितना सौभाग्यशाली हूं जो कि मुझे गंगा मां की पूरे ग्यारह माह सेवा करने का अवसर मिला।
बात उस समय की है जब शताब्दी का प्रथम अर्धकुम्भ प्रयाग में लगने वाला था यानि कि सन २००७। यह मेला विश्व का सबसे बड़ा मेला है। इसका अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस मेले की तैयारी में लगभग एक वर्ष का समय लगता है। मेले की देखरेख के लिए एक मेलाधिकारी की नियुक्ति की जाती है जो कि एक आई०ए०एस० संवर्ग का अधिकारी होता है तथा कई अन्य अधिकारी जो कि पी०सी०एस० संवर्ग के होते हैं की नियुक्ति की जाती है। मेला अवधि में पूरा मेला एक स्वतंत्र जिला घोषित कर दिया जाता है जिसकी अपनी पुलिस व्यवस्था, परिवहन, विद्युत, स्वास्थ्य, खाद्य एवं सफाई की व्यवस्थाएं खुद की होती है और इन कार्यों के लिए अलग-अलग विभागों का गठन ठीक उसी प्रकार किया जाता है जैसे कि एक जिले में होता है।


पुलिस व्यवस्था के लिए एक वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की नियुक्ति की जाती है जो कि आई०पी०एस० संवर्ग का अधिकारी होता है तथा उसका पूरा संगठन भी मेला अवधि तक के लिए नियुक्त किया जाता है। इसी प्रकार स्वास्थ्य विभाग का मुखिया मुख्य चिकित्साधिकारी होता है और जिले के समान ही उसका पूरा संगठन उसके साथ नियुक्त किया जाता है। पूरे मेले में एक प्रधान चिकित्सालय, कई क्षेत्रीय चिकित्सालय एवं सचल चिकित्सालयों की स्थापना की जाती है जिनमें सारी सुविधाएं पूर्णतया नि:शुल्क उपलब्ध होती हैं। जलनिगम एवं विद्युत विभाग में भी इसी प्रकार वरिष्ठ अधिकारियों की देखरेख में टीम का गठन किया जाता है। मेले में सिंचाई विभाग की भूमिका भी अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है। सिंचाई विभाग के अधिकारी एवं कर्मचारी सम्पूर्ण मेला अवधि तक गंगा के जल स्तर, घुमाव एवं कटाव आदि के प्रति सजग रहते हुए यथावश्यक कार्यवाही करते रहते हैं। इस मेले के संचालन में केवल सरकारी अनुदान ही कार्य नहीं करता वरन अनेक गैर-सरकारी संगठनों के साथ साथ घाटियों एवं पण्डों का योगदान भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। जिस प्रकार जब सारी उंगलिया मिलकर मुठ्ठी का रूप धारण कर लेती हैं तो उनकी संयुक्त शक्ति कई गुना बढ़ जाती है और वे समस्याओं का सामना आसानी से कर सकते हैं उसी प्रकार ये सारे छोटे-बड़े संगठन मिलकर जब एक समान उद्देश्य की पूर्ति के लिए मिलकर कार्य करते हैं तो कैसे न मेला सकुशल सम्पन्न हो।

मेले में कोई अप्रिय घटना न घटे इसके लिए सभी जी-जान से प्रयास करते हैं फिर भी यदि कोई घटना घट ही जाये तो प्रभावित व्यक्ति को समुचित मुआवजा मिल सके इसके लिए मेला में आने वाले समस्त व्यक्तियों का दुर्घटना बीमा सरकार की ओर से कराया जाता है। जैसे ही कोई व्यक्ति मेला की सीमा में प्रवेश करता है वह इस बीमा योजना से आच्छादित हो जाता है। मेले में कल्पवासियों को सस्ते दर पर खाद्यान्न एवं मिट्टी का तेल आदि उपलब्ध कराने के लिए मेले का अपना खाद्य एवं आपूर्ति विभाग होता है जो कि पूरे मेला क्षेत्र में सस्ते गल्ले, चीनी एवं मिट्टी के तेल की दूकानों की स्थापना करता है तथा कल्पवासियों को राशनकार्ड वितरित करता है।


संचार के साधन आज के समय की प्रमुख आवश्यकताओं में से एक हैं। पूरे मेला क्षेत्र में डाकघरों की स्थापना की जाती है जहां से हर समय डाक विभाग की सुविधाओं का लाभ कल्पवासी एवं आम जन उठा सकते हैं। कई मोबाइल कम्पनियां सचल एवं अस्थायी टावरों की स्थापना भी पूरे मेला क्षेत्र में करती हैं। इसके साथ ही बी०एस०एन०एल० तथा अन्य संचार कंपनियों को अपनी क्षमता भी बढ़ानी पड़ जाती है। मेले का अपना स्वयं का सूचना विभाग होता है जिसमें जिला स्तर के सक्षम अधिकारी पूरे साजो-सामान के साथ नियुक्त किये जाते हैं। मीडिया सम्बन्धी सभी मामले सूचना विभाग ही देखता है।

मेले में आये आम-जन एवं कल्पवासियों की सुविधा के लिए लगभग सभी बैंक अपनी शाखाएं मेला क्षेत्र में खोलते हैं और चंूकि अब सभी बैंकों का कम्प्यूटरीकरण हो चुका है इसलिए किसी अन्य शाखा एवं मेला में स्थापित की गयी शाखा की कार्यपद्धति में कोई अन्तर नहीं रह जाता। कोई भी व्यक्ति चाहे कहीं का मूल निवासी हो वह मेा में स्थापित शाखा से अपने खाते से सम्बन्धित किसी भी प्रकार का लेन-देन कर सकता है। कई बैंक मेला क्षेत्र में अस्थायी एवं सचल ए०टी०एम० मशीनों की स्थापना भी करते हैं। इस प्रकार वे अत्याधुनिक तकनीकों के माध्यम से हर सुविधा उपलब्ध कराने का भरपूर प्रयास करते हैं। मेले की एक खास बात है कि मेला क्षेत्र में आने वाला कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं सोता। पूरे मेले में जैसे दान-पुण्य करने की होढ़ सी लगी रहती है। मैने खुद मेला कार्यालय में लोगों को इस बात पर दुखी होते एवं अफसोस जाहिर करते हुए सुना है कि मैं इतना रूपये खर्च करने की इच्छा से आया था जबकि अभी तक मात्र इतने कम रूपये ही खर्च कर सका हूं। कोई मेले में लंगर चला रहा है जहां प्रतिदिन हजारों व्यक्ति भोजन करते हों तो कोई वस्त्र का दान कर रहा है, कोई नि:शुल्क दवा का वितरण कर रहा है तो कोई धार्मिक पुस्तकों का वितरण कर रहा है। सचमुच पूरा वातावरण ही दानमय हो जाता है।


मेला क्षेत्र में गंगा जी की शरण में आकर ही मुझे ये ज्ञान भी मिला कि गंगा मां क्यों हैं। बच्चा मां से कुछ भी मांगे तो मां अपने वात्सल्य के कारण मना नहीं कर पाती। इसी तरह गंगा मां से जो कोई जो कुछ मांगता है उसी उसकी मन की वस्तु मिल जाती है। कल्पना कीजिए यदि दान लेने वाला ही न होगा तो दान किसे दिया जायेगा। यहां दान लेने वालों की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। आप मेले में एक स्थान पर खड़े हो जाइये और अपने दायरे में आने वाले व्यक्तियों को अध्ययन कीजिए आपके ज्ञानचक्षु खुल जायेंगे। जितने व्यक्ति उतनी आकांक्षाएं और उनकी आकांक्षाएं पूरी हो रही हैं। जो नयनसुख के लिए आया है उसे नयनसुख मिल रहा है। जो व्यापार के लिए आया है उसे व्यापार मिल रहा है। जो धर्म के लिए आया है उसे धर्म करने का अवसर मिल रहा है। जो चोरी करने के लिए आया है उसे इतनी अपार भीड़ के कारण चोरी करने का अवसर मिल रहा है। जो बेईमानी करने के लिए आया है उसे बेईमानी करने का अवसर मिल रहा है। आपके दायरे में दुनिया का सत्य दिख जायेगा।

अभी चिठ्ठा लम्बा हो रहा है इसलिए अनुमति चाहूंगा। अगले चिठ्ठे में उस अनमोल बात या यूं कहें कि जो ज्ञान मुझे मेला में मिला, जो कि किसी खजाने से कम नहीं है, किताबों में पढ़ा था लेकिन प्रत्यक्ष देखने को मिला उसकी बात मैं बताउंगा तब तक के लिए विदा।

Friday, July 31, 2009

अर्धकुम्भ मेला २००७, इलाहाबाद : एक संस्मरण

अर्धकुम्भ मेला २००७, इलाहाबाद : एक संस्मरण


प्रयाग, तीर्थराज प्रयाग, जो अब इलाहाबाद के नाम से जाना जाता है। वर्ष २००७ में यहां शताब्दी का पहला अर्धकुम्भ मेला लग रहा है। पूरी दुनिया की निगाहें ४००१ बीघे में बसे इस मेले पर केन्द्रित है। दिनांक ११ सितम्बर २००६ से मुझे भी कम्प्यूटर आपरेटर के रूप में इस मेले का एक अंग होने का गौरव प्राप्त हुआ।
मैं कैसे मेले का अंग बना? यह सब महज संयोग ही था। मेरी मेले में सेवा देने की कोई पूर्व योजना नहीं थी। मैंने रेडियो मुख्यालय, उ०प्र० पुलिस द्वारा आयोजित रेडियो आपरेटर पद की परीक्षा दी थी जिसके लिए मैं प्रारम्भिक और शारीरिक दक्षता परीक्षाओं में उत्तीर्ण घोषित किया गया था। मैं इस परीक्षा को लेकर काफी उत्साहित एवं आशान्वित था मेरे परिचितो ने ज्योतिषियो से विचार-विमर्श द्वारा यह पता लगवा लिया था कि मेरे नक्षत्र प्रशासनिक सेवा की ओर संकेत कर रहे हैं और उसकी समय सन् २००१ में डाले गये फार्म के सापेक्ष बुलावा पत्र आने पर सभी इसे चमत्कार की दृष्टि से देख रहे थे। दिनांक १० अगस्त २००६ को इस परीक्षा का अन्तिम चरण मुख्य परीक्षा लखनउ में आयोजित होनी थी, जिसकी तैयारियों में मैं लगा था। उसी समय मेरे मित्र, सहयोगी, शुभेच्छु श्री गुलाब सिंह चौहान जी जो कि आई०ई०आर०टी० के कर्मचारी हैं, का फोन आया, उन्होंने बताया कि मुझे किसी स्थान पर सेवा देनी है जिसके लिए आई०ई०आर०टी० के निदेशक महोदय ने मुझे बुलाया है। मैंने परीक्षाओं को देखते हुए अपनी असमर्थता जाहिर कर दी। इस पर श्री सिंह ने कहा कि मैं एक बार निदेशक महोदय से मिल अवश्य लूं।
मैं २२ जुलाई को निदेशक महोदय श्री एस०सी० रोहतगी जी से मिलने आई०ई०आर०टी० गया। वहां चौहान जी ने मेरा परिचय आपने साथी कर्मचारी श्री रावत जी से कराया और फिर रावत जी मुझे निदेशक महोदय के पास ले गये। उस समय आई०ई०आर०टी० में काउन्सलिंग चल रही थी जिसके कारण निदेशक महोदय काफी व्यस्त थे फिर भी उन्होंने मुझे समुचित समय दिया। हल्का सा परिचय जानने के बाद उन्होंने मुझसे केवल यही अपेक्षा की कि "वहां पर सभी आई०ए०एस०@पी०सी०एस० अधिकारी हैं, उनसे डिक्टेशन लेना होगा, क्या तुम कर सकोगे?" मेरे हां कहने पर उन्होंने एक पत्र लिखकर मुझे तुरन्त त्रिवेणी बांध स्थित मेला कार्यालय में सम्पर्क करने को कहा।
मैं २५ जुलाई को मेला कार्यालय पहुंच गया, सभी अजनबी चेहरे। सभी मेरी ओर और में सबकी ओर देख रहा था लेकिन जैसा कि सरकारी कार्यालयों में होता है किसी ने यह जानने की इच्छा नहीं की कि यह कौन सा अजनबी व्यक्ति कार्यालय में घुस आया है और इधर उधर सबको निहार रहा है। काफी चेहरों के परीक्षण के उपरान्त मेरी निगाहों ने एक चेहरे का चुनाव किया, मैं उनके समक्ष गया, नमस्कार करने के बाद मैंने अपने आने का कारण उनसे बताया। इस पर उन्होंने अवगत कराया कि अभी मेलाधिकारी महोदय कार्यालय में नहीं हैं मैं कुछ देर प्रतीक्षा कर लूं। फिर मैंने पाण्डेय साहब, जिनका नाम मुझे याद नहीं था, के बारे में उनसे पूंछा तो पता चला कि दोनों लोग साथ-साथ सेना के अधिकारियों के साथ किसी बैठक में गये हैं। मैंने जानकारियां प्राप्त कीं और जानकारी देने वाले सज्जन को धन्यवाद देकर प्रतीक्षा करने लगा। यह जानकारी देने वाले सज्जन श्री आशीष कुमार मिश्रा जी, सहसीलदार-करछना थे जो कि वर्तमान में प्रबन्धक, अर्धकुम्भ मेला के पद पर तैनात थे। हालांकि मुझे इस बात की जानकारी उस समय नहीं थी जब मैं उनसे सूचनाएं ले रहा था, और उनका बात करने का तरीका इतना आत्मीय था कि मुझे लगा ही नहीं कि मैं तहसीलदार साहब के सामने बैठा हूं।
लगभग २ घंटे की प्रतीक्षा के बाद मेलाधिकारी महोदय अपने कक्ष में आये। ५-१० मिनट की प्रतीक्षा के बाद मैं उनसे मिलने गया और अपने आने का कारण बताया और निदेशक महोदय द्वारा दिया गया पत्र उन्हें दिया। उन्होंने १० मिनट बाद मिलने को कहा। मैं उनके कक्ष से बाहर निकल आया।
बाहर निकलने के बाद मैंने देखा कि एक कक्ष के सामने कम्प्यूटर कक्ष लिखा हुआ था। जब मैं उस कक्ष में गया तो वहां पर श्री संजय नारायण तिवारी जी से मुलाकात हुई जो कि वहां पर कम्प्यूटर आपरेटर के पद पर तैनात थे और कुम्भ २००१ में भी सफलतापूर्वक कार्य कर चुके थे। यहां पर आपको बताते चलें कि समूह ग के सारे पद उ०प्र० शासन की ओर से अस्थायी रूप से मेला अवधि तक के लिए स्वीकृत किये गये थे। श्री तिवारी जी से बात करके कार्यालय, कार्यालय के लोगों और कार्यालय की कार्यप्रणाली के बारे में काफी जानकारी मिली। हमारा औपचारिक परिचय हुआ। संजय जी इतने मिलनसार प्रकृति के व्यक्ति हैं कि ऐसा लग ही नहीं रहा था कि हम मात्र ५ मिनट पहले मिले हैं।
धीरे-धीरे आधे घंटे बीत गया तो में फिर मेलाधिकारी महोदय के कक्ष में गया। तब उन्होंने मुझसे पूंछा कि तुम क्या करते हो? मैने बताया कि छात्र हूं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता हूं और साथ ही कम्प्यूटर ज्ञान की बदौलत कुछ अर्जित भी कर लेता हूं। उन्होंने आगामी परीक्षाओं के बारे में जानकारी चाही तो मैं ने बताया कि १० अगस्त को रेडियो आपरेटर की परीक्षा लखनउ में देने जाना है। यह बात सुनकर उन्होंने मुझे ११ अगस्त से कार्यालय आने की बात कहकर, परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए जाने को कहा।
उसके बाद में घर आ गया, परीक्षा की तैयारी की और परीक्षा देने के बाद फिर मेला कार्यालय गया। मेरे मन में कई तरह की शंकाएं तैर रही थीं, कई तरह के प्रश्न मन में आ रहे थे, मैं सोच रहा था कि मैं मेलाधिकारी महोदय के समक्ष उपस्थित होकर अपना क्या परिचय दूंगा, आज तो मेरे पास किसी का पत्र भी नहीं है, पता नहीं इतने बड़े अधिकारी मुझे पहचानेंगे भी या नहीं। इसी तरह की उधेड़-बुन करते हुए मैं मेलाधिकारी महोदय के कक्ष में गया। मेरे आश्चर्य की उस समय सीमा न रही जबकि उन्होंने मुझे देखते ही मुझे मेरे नाम से पुकारा। इतनी व्यस्तता, इतनी जिम्मेदारी, प्रतिदिन सैकड़ों लोगों से मिलना, इन सबके बावजूद जिस व्यक्ति से वे पन्द्रह दिन पूर्व मात्र २ मिनट के लिए मिले थे और जो कि बहुत ही मामूली सा व्यक्ति था, उस व्यक्ति को उसके नाम से सम्बोधित करना, यह बात उनकी योग्यता का स्वयं में परिचय कराती है।
मेलाधिकारी महोदय श्री प्रज्ञान राम मिश्र जी का पैतृक निवास मदरा, मकूनपुर, मेजा में है और वर्तमान में ये सोहबतियाबाग में रहते हैं। मेलाधिकारी महोदय को एक-एक बात याद थी कि मेरा नाम क्या है और मुझे किसने किस कार्य के लिए भेजा है आदि आदि। वे बिल्कुल अन्धविश्वासी नहीं है। उन्होंने मेरी नियुक्ति के पूर्व मेरी परीक्षा लेने के लिए अपने पास ही बैठे हुए अपर मेलाधिकारी डा० एस०के० पाण्डेय जी की ओर इशारा करते हुए मेरी परीक्षा लेने के लिए कहा। वे मेरे साथ कम्प्यूटर कक्ष में गये और एक पत्र डिक्टेट किया, वे बोलते गये और मैं सीधे कम्प्यूटर पर टाइप करता गया। इस प्रकार मेरी परीक्षा पूर्ण हुई और मैं सफल घोषित किया गया। दूसरे दिन से मैंने अपनी सेवाएं प्रारम्भ कर दी। धीरे-धीरे समस्त कर्मचारियों से मेरा परिचय हुआ। सभी का व्यवहार इतना मधुर एवं स्नेहपूर्ण था कि मुझे ऐसा लग ही नहीं रहा था कि मैं एक-दो दिन पूर्व ही इस कार्यालय में आया हूं।
तो ये रही मेरी अर्धकुम्भ मेला में कम्प्यूटर आपरेटर के रूप में सेवा प्रारम्भ करने की कहानी। इस ग्यारह महीने की सेवा में कई तरह के मोड़ आये बहुत सी चीजें देखने और सुनने को मिली। कभी कभी तो ऐसी चीजों का व्यावहारिक रूप भी देखने को मिला जो किताबों में लिखी बातों को बिल्कुल ही उलट था। सचमुच यह गंगा मैया की कृपा ही है जो उन्होंने मुझे व्यावहारिक ज्ञान देने के लिए अपनी शरण दी, उन्हीं के प्रताप से मेरी आस्था भी बलवती हुई और होती ही गयी और धीरे-धीरे मैं आस्तिक बनता गया।

Friday, July 3, 2009

कभी रो के मुस्कुराये कभी मुस्कुरा के रोये,

कभी रो के मुस्कुराये कभी मुस्कुरा के रोये,
याद जितनी आयी, उन्हें भुला के रोये,
एक उनका ही नाम था जिसे हजार बार लिखा,
जितना लिख के खुश हुए, उससे ज्यादा मिटा के रोए।।

Thursday, July 2, 2009

होने थे जितने खेल मुकद्दर के हो गये,

होने थे जितने खेल मुकद्दर के हो गये,
हम टूटी नाव ले समन्दर में खो गये,
खुशबू हाथों को छू के गुजर गयी
हम फूल सजा-सजा के पत्थर से हो गये।।

होठ पे दोस्ती के फसाने नहीं आते,

होठ पे दोस्ती के फसाने नहीं आते,
साहिल पे समन्दर के खजाने नहीं आते,
उड़ने दो परिन्दों को हवा में,
वापस दोस्ताने के जमाने नहीं आते।।