Sunday, November 12, 2017

तुम्हारे विचार ही तुम्हारे कर्म हैं

बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। एक शिष्य ने पूछा- "कर्म क्या है?"
बुद्ध ने कहा- "मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।"

एक राजा हाथी पर बैठकर अपने राज्य का भ्रमण कर रहा था।अचानक वह एक दुकान के सामने रुका और अपने मंत्री से कहा- "मुझे नहीं पता क्यों, पर मैं इस दुकान के स्वामी को फाँसी देना चाहता हूँ।" यह सुनकर मंत्री को बहुत दु:ख हुआ। लेकिन जब तक वह राजा से कोई कारण पूछता, तब तक राजा आगे बढ़ गया।

अगले दिन, मंत्री उस दुकानदार से मिलने के लिए एक साधारण नागरिक के वेष में उसकी दुकान पर पहुँचा। उसने दुकानदार से ऐसे ही पूछ लिया कि उसका व्यापार कैसा चल रहा है? दुकानदार चंदन की लकड़ी बेचता था। उसने बहुत दुखी होकर बताया कि मुश्किल से ही उसे कोई ग्राहक मिलता है। लोग उसकी दुकान पर आते हैं, चंदन को सूँघते हैं और चले जाते हैं। वे चंदन कि गुणवत्ता की प्रशंसा भी करते हैं, पर ख़रीदते कुछ नहीं। अब उसकी आशा केवल इस बात पर टिकी है कि राजा जल्दी ही मर जाएगा। उसकी अन्त्येष्टि के लिए बड़ी मात्रा में चंदन की लकड़ी खरीदी जाएगी। वह आसपास अकेला चंदन की लकड़ी का दुकानदार था, इसलिए उसे पक्का विश्वास था कि राजा के मरने पर उसके दिन बदलेंगे।

अब मंत्री की समझ में आ गया कि राजा उसकी दुकान के सामने क्यों रुका था और क्यों दुकानदार को मार डालने की इच्छा व्यक्त की थी। शायद दुकानदार के नकारात्मक विचारों की तरंगों ने राजा पर वैसा प्रभाव डाला था, जिसने उसके बदले में दुकानदार के प्रति अपने अन्दर उसी तरह के नकारात्मक विचारों का अनुभव किया था।

बुद्धिमान मंत्री ने इस विषय पर कुछ क्षण तक विचार किया। फिर उसने अपनी पहचान और पिछले दिन की घटना बताये बिना कुछ चन्दन की लकड़ी ख़रीदने की इच्छा व्यक्त की। दुकानदार बहुत खुश हुआ। उसने चंदन को अच्छी तरह कागज में लपेटकर मंत्री को दे दिया।

जब मंत्री महल में लौटा तो वह सीधा दरबार में गया जहाँ राजा बैठा हुआ था और सूचना दी कि चंदन की लकड़ी के दुकानदार ने उसे एक भेंट भेजी है। राजा को आश्चर्य हुआ। जब उसने बंडल को खोला तो उसमें सुनहरे रंग के श्रेष्ठ चंदन की लकड़ी और उसकी सुगंध को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। प्रसन्न होकर उसने चंदन के व्यापारी के लिए कुछ सोने के सिक्के भिजवा दिये। राजा को यह सोचकर अपने हृदय में बहुत खेद हुआ कि उसे दुकानदार को मारने का अवांछित विचार आया था।

जब दुकानदार को राजा से सोने के सिक्के प्राप्त हुए, तो वह भी आश्चर्यचकित हो गया। वह राजा के गुण गाने लगा जिसने सोने के सिक्के भेजकर उसे ग़रीबी के अभिशाप से बचा लिया था। कुछ समय बाद उसे अपने उन कलुषित विचारों की याद आयी जो वह राजा के प्रति सोचा करता था। उसे अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ऐसे नकारात्मक विचार करने पर बहुत पश्चात्ताप हुआ।

यदि हम दूसरे व्यक्तियों के प्रति अच्छे और दयालु विचार रखेंगे, तो वे सकारात्मक विचार हमारे पास अनुकूल रूप में ही लौटेंगे। लेकिन यदि हम बुरे विचारों को पालेंगे, तो वे विचार हमारे पास उसी रूप में लौटेंगे।

यह कहानी सुनाकर बुद्ध ने पूछा- "कर्म क्या है?" अनेक शिष्यों ने उत्तर दिया- "हमारे शब्द, हमारे कार्य, हमारी भावनायें, हमारी गतिविधियाँ..."

बुद्ध ने सिर हिलाया और कहा- "तुम्हारे विचार ही तुम्हारे कर्म हैं।"

Sunday, October 29, 2017

Old Man and Tree || बूढा आदमी और पेड

    एक बच्चे को आम का पेड़ बहुत पसंद था। जब भी फुर्सत मिलती वो आम के पेड के पास पहुच जाता। पेड के उपर चढ़ता,आम खाता,खेलता और थक जाने पर उसी की छाया मे सो जाता। उस बच्चे और आम के पेड के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया। बच्चा जैसे-जैसे बडा होता गया वैसे-वैसे उसने पेड के पास आना कम कर दिया। कुछ समय बाद तो बिल्कुल ही बंद हो गया। आम का पेड उस बालक को याद करके अकेला रोता।
    एक दिन अचानक पेड ने उस बच्चे को अपनी तरफ आते देखा और पास आने पर कहा, "तू कहां चला गया था? मै रोज तुम्हे याद किया करता था। चलो आज फिर से दोनो खेलते है।" बच्चे ने आम के पेड से कहा, "अब मेरी खेलने की उम्र नही है। मुझे पढना है,लेकिन मेरे पास फीस भरने के पैसे नही है।" पेड ने कहा, "तू मेरे आम लेकर बाजार मे बेच दे, इससे जो पैसे मिले अपनी फीस भर देना।" उस बच्चे ने आम के पेड से सारे आम तोड़ लिए और उन सब आमो को लेकर वहा से चला गया। उसके बाद फिर कभी दिखाई नही दिया।आम का पेड उसकी राह देखता रहता।
    एक दिन वो फिर आया और कहने लगा, "अब मुझे नौकरी मिल गई है, मेरी शादी हो चुकी है, मुझे मेरा अपना घर बनाना है,इसके लिए मेरे पास अब पैसे नही है।" आम के पेड ने कहा, "तू मेरी सभी डाली को काट कर ले जा,उससे अपना घर बना ले।" उस जवान ने पेड की सभी डाली काट ली और ले के चला गया।
    आम के पेड के पास अब कुछ नहीं था वो अब बिल्कुल बंजर हो गया था। कोई उसे देखता भी नहीं था। पेड ने भी अब वो बालक/जवान उसके पास फिर आयेगा यह उम्मीद छोड दी थी। फिर एक दिन अचानक वहाँ एक बुढा आदमी आया। उसने आम के पेड से कहा, "शायद आपने मुझे नही पहचाना, मैं वही बालक हूं जो बार-बार आपके पास आता और आप हमेशा अपने टुकड़े काटकर भी मेरी मदद करते थे।" आम के पेड ने दु:ख के साथ कहा, "पर बेटा मेरे पास अब ऐसा कुछ भी नही जो मै तुम्हे दे सकूँ।" वृद्ध ने आंखो मे आंसु लिए कहा, "आज मै आपसे कुछ लेने नही आया हूं बल्कि आज तो मुझे आपके साथ जी भरके खेलना है, आपकी गोद मे सर रखकर सो जाना है।" इतना कहकर वो आम के पेड से लिपट गया और आम के पेड की सुखी हुई डाली फिर से अंकुरित हो उठी।

वो आम का पेड़ कोई और नही हमारे माता-पिता हैं दोस्तों। जब छोटे थे उनके साथ खेलना अच्छा लगता था। जैसे-जैसे बडे होते चले गये जिम्‍मेदारियों के मायाजाल में जकडकर उनसे दूर होते गये। पास भी तब आये जब कोई जरूरत पडी, कोई समस्या खडी हुई। आज कई माँ बाप उस बंजर पेड की तरह अपने बच्चों की राह देख रहे है। जाकर उनसे लिपटे, उनके गले लग जाये। उनकी जी भर सेवा करें। फिर देखना वृद्धावस्था में उनका जीवन फिर से अंकुरित हो उठेगा।

Friday, October 27, 2017

राजा और चिड़िया || Raja Aur Chidiya || The King and the Bird

    राजा के विशाल महल में एक सुंदर वाटिका थी, जिसमें अंगूरों की एक बेल लगी थी। वहां रोज एक चिड़िया आती और मीठे अंगूर चुन-चुनकर खा जाती मगर अधपके और खट्टे अंगूरों को नीचे गिरा देती। माली ने चिड़िया को पकड़ने की बहुत कोशिश की पर वह हाथ नहीं आई। हताश होकर एक दिन माली ने राजा को यह बात बताई। यह सुनकर भानुप्रताप को आश्चर्य हुआ। उसने चिड़िया को सबक सिखाने की ठान ली। एक दिन वह वाटिका में छिपकर बैठ गया। जब चिड़िया अंगूर खाने आई तो राजा ने फुर्ती से उसे पकड़ लिया।
    जब राजा चिड़िया को मारने लगा, तो चिड़िया ने कहा, 'हे राजन, मुझे मत मारो। मैं आपको ज्ञान की 4 महत्वपूर्ण बातें बताऊंगी।' राजा ने कहा, 'जल्दी बता।' चिड़िया बोली, 'हे राजन, सबसे पहले तो हाथ में आए शत्रु को कभी मत छोड़ो।' राजा ने कहा, 'दूसरी बात बता।' चिड़िया ने कहा, 'असंभव बात पर भूलकर भी विश्वास मत करो और तीसरी बात यह है कि बीती बातों पर कभी पश्चाताप मत करो'
    राजा ने कहा, 'अब चौथी बात भी जल्दी बता दो।' इस पर चिड़िया बोली, 'चौथी बात बड़ी गूढ़ और रहस्यमयी है। मुझे जरा ढीला छोड़ दें क्योंकि मेरा दम घुट रहा है। कुछ सांस लेकर ही बता सकूंगी।' चिड़िया की बात सुन जैसे ही राजा ने अपना हाथ ढीला किया, चिड़िया उड़कर एक डाल पर बैठ गई और बोली, 'मेरे पेट में दो हीरे हैं'
    यह सुनकर राजा पश्चाताप में डूब गया। राजा की हालत देख चिड़िया बोली, 'हे राजन, ज्ञान की बात सुनने और पढ़ने से कुछ लाभ नहीं होता, उस पर अमल करने से होता है। आपने मेरी बात नहीं मानी। मैं आपकी शत्रु थी, फिर भी आपने पकड़कर मुझे छोड़ दिया। मैंने यह असंभव बात कही कि मेरे पेट में दो हीरे हैं फिर भी आपने उस पर भरोसा कर लिया। आपके हाथ में वे काल्पनिक हीरे नहीं आए तो आप पछताने लगे।

उपदेशों को जीवन में उतारे बगैर उनका कोई मोल नहीं।  

Tuesday, September 26, 2017

दृष्‍टान्‍त - एक साधु की कथा

एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा चला जा रहा था कि अपनी ही धुन में रहने वाले इस साधु ने एक मिठाई की दुकान को देखा जहां एक कढ़ाई में गरम दूध उबाला जा रहा था, तो मौसम के हिसाब से दूसरी कढ़ाई में गरमा गरम जलेबियां तैयार हो रही थी। साधु कुछ क्षणों के लिए वहाँ रुक गया। शायद भूख का एहसास हो रहा था या मौसम का असर था, साधु हलवाई की भट्ठी को बड़े गौर से देखने लगा साधु कुछ खाना चाहता था। अपनी मस्ती के बीच इस भूख को जान वह प्रभु को स्मरण कर मन ही मन कहा कि क्या क्या लीला करते होक्योंकि साधु की जेब ही नहीं थी तो पैसे भला कहां से होते.... साधु कुछ पल भट्ठी से हाथ  सेंकने के बाद चला ही जाना चाहता था कि नेक दिल हलवाई से रहा न गया और एक प्याला गरम दूध और कुछ जलेबियां साधु को दें दी। अपनी धुन का मस्त वो साधु प्रभु की मर्जी समझ गरम जलेबियां गरम दूध के साथ खाई और फिर हाथों को ऊपर की ओर उठाकर हलवाई के लिऐ प्रार्थना की, फिर आगे चल दिया। 

साधु बाबा का पेट भर चुका था दुनिया के दु:खों से बेपरवाह वे फिर इक नए जोश से बारिश के गंदले पानी के छींटे उड़ाता चला जा रहा था। वह इस बात से बेखबर था कि एक युवा नव विवाहिता जोड़ा भी वर्षा के जल से बचता बचाता उसके पीछे चला आ रहें है। एक बार इस मस्त साधु ने बारिश के गंदले पानी में जोर से लात मारी..... बारिश का पानी उड़ता हुआ सीधा पीछे आने वाली युवती के कपड़ों को भिगो गया उस औरत के कीमती कपड़े कीचड़ से लथपथ हो गये। उसके युवा पति से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई, इसलिए वह आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़ा और साधु के कपड़ो से पकड़ कर कहने लगा अंधा है...... तुमको नज़र नहीं आता तेरी हरकत की वजह से मेरी पत्नी के कपड़े गीले हो गऐ हैं और कीचड़ से भर गऐ हैं.....। 

साधु हक्का-बक्का सा खड़ा था, जबकि इस युवा को साधु का चुप रहना नाखुशगवार गुजर रहा था।महिला ने आगे बढ़कर युवा के हाथों से साधु को छुड़ाना भी चाहा, लेकिन युवा की आंखों से निकलती नफरत की चिंगारी देख वह भी फिर पीछे खिसकने पर मजबूर हो गई। राह चलते राहगीर भी उदासीनता से यह सब दृश्य देख रहे थे लेकिन युवा के गुस्से को देखकर किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रोक पाते और आख़िर जवानी के नशे मे चूर इस युवक ने एक जोरदार थप्पड़ साधु के चेहरे पर जड़ दिया बूढ़ा साधु थप्पड़ की मार से लड़खड़ाता हुऐ कीचड़ में जा पड़ा। युवक ने जब साधु को नीचे गिरता देखा तो मुस्कुराते हुए वहां से चल दिया। बूढे साधु ने आकाश की ओर देखा और उसके होठों से निकला वाह मेरे भगवान कभी गरम दूध जलेबियां और कभी गरम थप्पड़.... लेकिन जो तू चाहे मुझे भी वही पसंद है। यह कहता हुआ वह एक बार फिर अपने रास्ते पर चल दिया।

दूसरी ओर वह युवा जोड़ा अपनी मस्ती को समर्पित अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो गया। थोड़ी ही दूर चलने के बाद वे एक मकान के सामने पहुंचकर रुक गए। वह अपने घर पहुंच गए थे, वे युवा अपनी जेब से चाबी निकाल कर अपनी पत्नी से हंसी मजाक करते हुए ऊपर घर की सीढ़ियों तय कर रहा था। बारिश के कारण सीढ़ियों पर फिसलन हो गई थी अचानक युवा का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से नीचे गिरने लगा। महिला ने बहुत जोर से शोर मचा कर लोगों का ध्यान अपने पति की ओर आकर्षित करने लगी जिसकी वजह से काफी लोग तुरंत सहायता के लिये युवा की ओर लपके..... लेकिन देर हो चुकी थी युवक का सिर फट गया था और कुछ ही देर मे ज्यादा खून बह जाने के कारण इस नौजवान युवक की मौत हो चुकी थी। 

कुछ लोगों ने दूर से आते साधु बाबा को देखा तो आपस में कानाफुसी होने लगीं कि निश्चित रूप से इस साधु बाबा ने थप्पड़ खाकर युवा को श्राप दिया है, अन्यथा ऐसे नौजवान युवक का केवल सीढ़ियों से गिर कर मर जाना बड़े अचम्भे की बात लगती है। कुछ मनचले युवकों ने यह बात सुनकर साधु बाबा को घेर लिया एक युवा कहने लगा - 'आप कैसे भगवान के भक्त हैं जो केवल एक थप्पड़ के कारण युवा को श्राप दे बैठे। भगवान के भक्त मे रोष व गुस्‍सा हरगिज़ नहीं होता। आप तो जरा सी असुविधा पर भी धैर्य न कर सकें।' साधु बाबा कहने लगा भगवान की क़सम मैंने इस युवा को श्राप नहीं दिया। अगर आप ने श्राप नहीं दिया तो ऐसा नौजवान युवा सीढ़ियों से गिरकर कैसे मर गया

तब साधु बाबा ने दर्शकों से एक अनोखा सवाल किया कि आप में से कोई इस सब घटना का चश्मदीद गवाह मौजूद हैएक युवक ने आगे बढ़कर कहा, 'हाँ मैं इस सब घटना का चश्मदीद गवाह हूँ ।' साधु ने अगला सवाल किया- 'मेरे क़दमों से जो कीचड़ उछला था क्या उसने युवा के कपड़े को दागी किया था?' युवा बोला- 'नहीं...!! लेकिन महिला के कपड़े जरूर खराब हुए थे' उस मस्ताने साधु ने युवक की बाँहों को थामते हुए पूछा, ' फिर युवक ने मुझे क्यों मारा?' युवा कहने लगा-' क्योंकि वह युवा इस महिला का प्रेमी था और यह बर्दाश्त नहीं कर सका कि कोई उसके प्रेमी के कपड़ों को गंदा करे..... इसलिए उस युवक ने आपको मारा....' 

युवा की बात सुनकर साधु बाबा ने एक जोरदार ठहाका बुलंद किया और यह कहता हुआ वहाँ से विदा हो गया, 'तो भगवान की क़सम मैंने श्राप कभी किसी को नहीं दिया लेकिन कोई है जो मुझ से प्रेम रखता है। अगर उसका यार सहन नहीं कर सका तो मेरे यार को कैसे बर्दाश्त होगा कि कोई मुझे मारे और वह इतना शक्तिशाली है कि दुनिया का बड़े से बड़ा राजा भी उसकी लाठी से डरता है।मेरा यार.. , मेरा प्यार... , वो परमात्मा ही है। उस परमात्मा की लाठी दीख़ती नही और आवाज भी नही करती लेकिन पडती हैं तों बहुत दर्द देती है।'


हमारे कर्म ही हमें उसकी लाठी से बचातें हैं बस कर्म अच्छे होने चाहिये...

Sunday, January 26, 2014

पीए साहब || PA Sahab


पात्र परिचय
पीए साहब        एक बत्तीस वर्ष का नौजवान, पढ़ा-लिखा, ऊर्जावान, अच्छी कद-काठी का जवान।
बड़े बाबू         एक सरकारी कार्यालय के कार्यालय अधीक्षक, उम्र लगभग 55 वर्ष। दुबला-पतला शरीर, चेहरे एवं पहनावे से शालीन।
रामधनी        सरकारी कार्यालय का चपरासी। उम्र लगभग 50 से 55 वर्ष के बीच। कुर्ता-पाजामा पहने हुए और कन्धे पर एक गमछा रखे हुए। शरीर दुबला पतला है। चेहरे पर चमक है। शान्त स्वभाव का सीध-साधा कर्मचारी। 
मिश्राजी, शर्माजी, जावेद, अच्छेलाल - उसी सरकारी कार्यालय के अन्य कर्मचारीगण, पहनावा सामान्य।

प्रथम दृश्य
सब कुछ रोज जैसा ही चल रहा है। रामधनी ने आकर कार्यालय का दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही सफाईकर्मी अपने अपने काम में लग गये। रामधनी ने एक कुशल पर्यवेक्षक की तरह कार्यालय के कोने कोने की सफाई करवाई। जब रामधनी कार्यालय की सफाई से आश्वस्त हो गया तब उसने साहब की मेज को व्यवस्थित किया, बगिया से दौड़कर फूल लाया और गुलदस्ता सजाया। गिलास को कई बार धुल-चमकाकर साहब के लिए पीने का पानी रखा। रामधनी इस कार्यालय का सबसे पुराना चपरासी है। यह सब कार्य उसकी दैनिक दिनचर्या का अंग हैं। वह बिना चूके प्रतिदिन एक मुस्तैद सिपाही की तरह सारे कार्यों को अन्जाम देता है।

साहब के कमरे से ही लगा हुआ एक छोटा सा कमरा साहब के वैयक्तिक सहायक का है। कार्यालय में सब उन्हें पीए साहब कहते हैं। साहब-सूबा तो रौबदार होते ही हैं पीए साहब उनसे भी अधिक रौबदार हैं। साहब के कमरे की साफ-सफाई के बाद रामधनी ने उसी लगन एवं मुस्तैदी के साथ पीए साहब का कमरा व्यवस्थित किया और फिर वहीं बैठकर साहब के आने की प्रतीक्षा करने लगा।

(पीए साहब का प्रवेश। शक्ल-सूरत एवं पहनावे से अफसर सरीखे। चाल-ढाल भी अफसरों जैसी। एक पढ़े-लिखे व्यक्ति की छवि। दिमाग में पता नहीं क्या उधेड़-बुन चल रही है। लग रहा है पूरे देश की जिम्मेदारी इन्हीं के कन्धों पर जबरन लाद दी गयी हो।)

पीए (बुदबुदाते हुए)-   कैसे कामचोरों से पाला पड़ा है। एक काम भी ठीक से नहीं कर सकते। (चिल्लाते हुए) रामधनी .... रामधनी .......
रामधनी - जी साहब
पीए - ये क्या रामधनी। तुमको एक बारे में कोई चीज समझ में नहीं आती? ये फाइल फिर यहां कैसे आ गयी?
रामधनी (धीरे से)- जी.... बड़े साहब आपय के देय के कहे रहे ...।
पीए - (गुस्से से चिल्लाते हुए) - देय के कहे रहे। .... अरे देय के कहे रहे तो क्या तू मेरे सिर पर रख देगा? ...  उधर रख आलमारी में। (बुदबुदाते हुए) किसी से प्यार से बोल क्या दो सिर पर चढ़ जाते हैं। आपय के देय के कहे रहे ...
रामधनी (चुटकी लेते हुए) - साहेब आज घर से झगड़ा कइ के आये हैं का? बड़े गुस्सा मा हैं?
पीए - फालतू बकवास बन्द। जा के एक कप चाय बना के ला। और हां .... शक्कर थोड़ी ज्यादा डालना। ... (सिर पर हाथ फेरते हुए, खुद से ही ) ... सिर दर्द से फटा जा रहा है।
(रामधनी चाय बनाने के लिए जैसे ही कमरे से बाहर निकलता है, दरवाजे पर खड़े बड़े बाबूजी से टकराते-टकराते बचता है।)
रामधनी - राम राम बाबू जी।
बड़े बाबू- राम राम। ... और रामधनी ... सुबह सुबह कहां दौड़ लगा दी?
रामधनी - कुछ नहीं बाबू जी। पीए साहेब की खातिर चाय बनावे जा रहे हैं। (धीरे से) आजकल न जाने का होइ गवा है सीधे मुह बातय नहीं करते।
(बड़े बाबू और रामधनी की उम्र में ज्यादा अन्तर न था। दोनों के पचास बसन्त पूरे हो चुके थे। इस कार्यालय में दोनों ने साथ साथ बीस-बाईस बरस तक अच्छे-बुरे दिन साथ-साथ बिताये। कभी एक-दूसरे को शिकायत का मौका नहीं मिला। कभी किसी बात पर कुछ कहा सुनी हो भी गयी तो फिर कुछ ही देर में सब कुछ कहा-सुना माफ, जैसे कुछ हुआ ही न हो। उम्र के इस दौर में यदि व्यक्ति को अनावश्यक डांट-फटकार मिले तो उसका हृदय दुखी होना स्वाभाविक था।)
रामधनी (दुखी मन से) - आप तो सब जानिथ है बड़े बाबू। एतनी उमिर बीत गई। कभौ सिकाइत के मौका नहीं दिहा। ना जाने काहे आजकल पीए साहेब हमसे गुस्सा हैं। ई उमिर में ई सब बर्दास नहीं होय बाबू जी। बाबूजी हमार ड्यूटी कहूं अउर लगवाय दें। कउनव दिन हमरे मुहे से कुछ निकल गवा ....
बड़े बाबू - (बड़े बाबू ने आश्वस्त करने वाली मुस्कान के साथ रामधनी की ओर देखा और रामधनी के कंधे पर हाथ रखकर ढाढस बंधाते हुए बोले) मैं बात करता हूं। .... तुम जाओ अपना काम करो ...
(बड़े बाबू ने रामधनी को आश्वासन तो दे दिया, लेकिन वे खुद भी बड़े असमंजस में हैं कि वे पीए से कहें भी तो क्या कहें। इन दिनों कई मसलों पर उनकी खुद की पीए से कहासुनी हो चुकी है। लेकिन बड़े बाबू होने के नाते, कार्यालय का मुखिया होने के नाते ये उनका कर्तव्य है कि वे कार्यालय के अन्दर काम करने का एक अच्छा वातावरण बना कर रखें। उन्होंने हिम्मत बटोरी और चल पड़े पीए के पास)
बड़े बाबू (सौम्य मुस्कान से साथ) - क्या पीए साहब! बड़ा हो-हल्ला मचा रखा है।
पीए - ये सब आपके कारण ही हो रहा है। कार्यालय की कोई मर्यादा ही नहीं है। टके-टके के आदमी काम कम करते हैं और जुबान ज्यादा चलाते हैं। मेरे साथ ये सब न चलेगा। आप ही इन्हें अपने सिर पर बिठा कर रखिये। 
(पीए साहब और न जाने क्या-क्या बड़बड़ाते रहे। बड़े बाबू अपना सा मुंह लेकर उल्टे पांव वापस आ गये। बड़े बाबू को मन में मलाल था कि वे आखिर क्यों गये पीए के पास। उम्र में बड़े बाबू पीए के पिता के समान हैं। उनका स्वभाव इतना सीधा और सरल था कि आज तक उनपर कोई उंगली तक न उठा सका था। बड़े बाबू ने अपने चारों तरफ देखा कि किसी ने देखा या सुना तो नहीं। चलो गनीमत यही थी कि अभी कार्यालय में कोई आया नहीं था। वैसे भी सरकारी कार्यालयों में ग्यारह बजे के पहले कोई आता भी कहां है। बड़े बाबू की इज्जत इस लेट-लतीफी की वजह से बच गई। रामधनी सब सुन-देख रहा था, लेकिन बड़े बाबू को उस पर अपने से ज्यादा भरोसा था। वे जानते थे कि रामधनी ऐसी बातों का जिक्र किसी से भी नहीं करेगा। रामधनी भले ही इन बातों को जिक्र कहीं न करे लेकिन ये बातें छिपती नहीं हैं।)

द्वितीय दृश्य

आज कार्यालय में चर्चा का बाजार गर्म है। हर तरफ यही चर्चा चल रही है। सभी कुछ न कुछ बुदबुदा रहे हैं। जैसे-तैसे दोपहर हुई। लन्च का समय होते ही सभी बाबू चाय की दूकानों की तरफ चल पड़े। आज तो सबके पैरों में कुछ ज्यादा ही गति थी। सभी एक-दूसरे को पुकारते हुए कार्यालय के बाहर निकल रहे थे जैसे किसी अतिमहत्वूपर्ण मिशन पर निकल रहे हों। दूकान पर पहुंच कर।)

मिश्रा जी - आज सबकी चाय मेरी तरफ से। (दूकानदार की तरफ) गुड्डू भाई चार चाय देना और साथ में थोड़ी नमकीन भी। 
शर्मा जी - अरे चार नहीं पांच चाय देना। बड़े बाबू भी आ रहे हैं। (बड़े बाबू की तरफ) अरे बड़े बाबू जी आइये .... आइये ... इधर बैठिये ... (कुर्सी उनकी ओर सरकाते हुए)
बड़े बाबू (कुर्सी पर बैठते हुए। चेहरे पर वही सौम्य मुस्कान। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। चुटकी लेते हुए) - आज पूरा का पूरा अमला एक साथ .... क्या बात है भाई? ....
मिश्रा जी (शिकायती लहजे में) - आप तो जैसे कुछ जानते ही नहीं। ...
बड़े बाबू (स्थिर भाव से) - सही कह रहा हूं। मुझे नहीं पता। किसी का जन्मदिन है क्या आज? (प्रश्नवाचक मुद्रा में) 
जावेद - अच्छा बड़े बाबू जब आपको नहीं मालूम तो आप बैठिये और आराम से चाय पीजिए।
शर्मा जी - भाई मैं तो कहता हूं कि ऐसे आदमी के साथ अब काम करना मुश्किल है। बात-बात में गरम हो जाता है। हमारे शरीर में भी खून है। किसी दिन .....
जावेद - मुझसे तो कभी टकराया ही नहीं। नहीं तो वहीं पर दो-चार धर के आता। कोई चूड़ियां नहीं पहन रखी है। आप लोग पता नहीं कैसे बर्दाश्त करते हैं ...
अच्छेलाल - मुझे तो कोई और ही चक्कर समझ में आता है। देखते नहीं आजकल कितनी छुट्टियां लेता है। आये दिन बाहर जाता है। किसी लड़की-वड़की का ......
बड़े बाबू - अरे भाई .... ऐसी कोई बात नहीं है। मैं अच्छी तरह जानता हूं उसे। वो ऐसा लड़का नहीं है। 
मिश्रा जी - सही बात। बिना जाने समझे किसी के चरित्र पर कीचड़ नहीं उछालना चाहिए।
जावेद (मजाकिया लहजे में) - अगर किसी जिन्न या प्रेत का चक्कर हो तो मैं जानता हूं झाड़-फूंक करने वाले एक फकीर को .... बहुत पहुंचे हुए हैं ... हा हा हा ... (सभी हंसने लगते हैं)
बड़े बाबू (विचारमग्न मुद्रा में। गम्भीर स्वर में) - मुझे लगता है कि वो किसी नशे का आदी हो गया है। आज का युवा नशे का शिकार बड़ी तेजी से हो रहा है खासकर जो युवा स्वावलम्बी हैं। इसीलिए हमेशा खोया-खोया रहता है और बहकी-बहकी बातें करता है।
मिश्रा जी - बड़े बाबू .... मुझे भी यही लगता है कि वह किसी नशीली गोली का सेवन करता है। क्योंकि एक बार जब मैं उसके कमरे में गया तो वो कोई दवा खाकर पानी पी रहा था। मेरे लाख पूछने पर भी बन्दे ने न तो मर्ज बताया और न ही दवा का रैपर देखने दिया। पहले तो मैं ही उसका फैमिली वैद्य हुआ करता था। डाक्टर कुछ भी दवा लिख दे,... बन्दा मुझसे सलाह किये मजाल क्या थी कि एक भी गोली खा ले।
शर्मा जी - मुझे भी यही लगता है। देखते नहीं आजकल कैसा झुंझलाया सा रहता है। और मैंने तो यहां तक भी सुना है कि आजकल बड़े साहब से भी पटरी नहीं खा रही है।
बड़े बाबू (घड़ी देखते हुए) - अरे भाई कार्यालय नहीं चलना है क्या। जलपान का समय कब का खत्म हो गया और तुम्हारी चैपाल है कि खत्म ही नहीं होती। चलो- चलो .. (सभी उठकर कार्यालय की ओर जाते हैं। मिश्रा जी दुकानदार को पैसे देते हैं।) 

तृतीय दृश्य
पन्द्रह दिनों के बाद
आज भी कार्यालय रोज की तरह खुला, लेकिन रामधनी के चेहरे से मुस्तैदी गायब है। कार्यालय की साफ-सफाई रोज की तरह ही हुई। कार्यालय में जैसे कोई रौनक ही न हो। कार्यालय की साफ सफाई खतम हुई। धीरे-धीरे करके सभी कर्मचारी आने लगे। रोज की तरह सबसे पहले बड़े बाबू, उसके बाद मिश्राजी, शर्माजी सबसे अन्त में अच्छेलाल। सबके चेहरे पर मायूसी और प्रश्नचिह्न साफ-साफ झलक रहा था। बड़े बाबू ने बिना किसी से कोई बात किये अपनी दराज खोली और लिफाफों का एक बंडल निकाला। हर लिफाफे पर एक-एक कर्मचारी का नाम लिखा था। ये लिफाफे पीए साहब ने बड़े बाबू के पास छुट्टी जाते समय रख दिया था साथ ही निर्देश भी दिया था कि इन लिफाफों को वितरित करने का समय पीए साहब बतायेंगे। यह कौन जानता था कि पीए साहब का यह अवकाश उनका अन्तिम अवकाश है और वे कभी न खत्म होने वाले अवकाश पर चले जायेंगे। पीए साहब की असामयिक मृत्यु ने सभी को सकते में डाल दिया है। कल रात बड़े बाबू के पास पीए साहब के घर से उनकी मृत्यु की खबर आई साथ ही लिफाफे बांटने का सन्देश भी मिला। बड़े बाबू ने आज कार्यालय आकब सबसे पहले लिफाफे बांटने का ही कार्य किया। एक-एक करके सबने लिफाफे लिए। सभी लिफाफों में एक-एक खत था। सभी ने असमंजस के साथ खत खोला और पढ़ने लगे। सब अपना-अपना खत पढ़ रहे हैं और उनकी आंखों से पश्चाताप के आंसू अनायास ही बहे जा रहे हैं। किसी की हिम्मत नहीं हो रही है कि वह एक-दूसरे से आंख मिला सके या यह देख सके कि दूसरा भी रो रहा है या नहीं। बड़े बाबू ने भी अपना खत पढ़ा और खत मेज पर रखकर अपना चश्मा उतारा और आंसू पोंछे। बड़े बाबू को कुछ स्थिर देखकर.... रामधनी बड़े बाबू के पास आकर धीरे से कहता है
रामधनी - हे बड़े बाबू, तोहार गोड़ लागी ... तनी हमरव लिफफवा खाली न ....। तनी पढ़ि के सुनाई त कि हमरे पीए साहेब का लिखे हैं। हम निरक्षर आदमी ई करिया अच्छर का समझी।
बड़े बाबू (आंसू पोछकर चश्मा उठाते हैं और रामधनी से पत्र लेकर पढ़ते हैं।) - रामधनी काका, जब ये खत आपको मिलेगा तब तक मैं आपसे बहुत दूर जा चुका होउंगा। मैं जानता हूं कि मुझे ब्लड कैंसर है और बीमारी इस स्तर पर पहुंच चुकी है कि अब इसका कोई इलाज नहीं। मैं चाहता था कि मेरे जाने के बाद आप सब को दुख न हो इसलिए मैंने जानबूझ कर रूखा स्वभाव अपना लिया था। रामधनी काका आप तो मेरे पिता के समान हैं, मेरा कहा-सुना अपना बेटा मानकर भुला देना और हो सके तो मुझे माफ कर देना। 
आपका अपना
पीए साहब

Saturday, January 25, 2014

मैं भी लिख सकता हूं कविता


फिर आया है याद मुझे कि
मैं भी लिख सकता हूं कविता।
नभ-जल-थल-आकाश विषय पर,
जीवन के एहसास, समय पर
भूली बिसरी यादों पर
पूस-माघ और भादों पर
जीवन में जो घटता-बचता
मैं भी लिख सकता हूं कविता।

जीना-मरना, जस-अपजस पर
यति-गत, नीरस और सरस पर
हर्ष-विषाद, सबल-निर्बल पर
हार-जीत और ठोस-तरल पर
शब्द-विलोम से रच दी कविता
मैं भी लिख सकता हूं कविता।

पक्षी-विहग-शकुनि-नभचर पर
दैत्य-दनुज-राक्षस-निशिचर पर
भानु-भास्कर-रवि-दिनकर पर
भंवरा-मधुप-भ्रमर-मधुकर पर
सम-अर्थी शब्दों की कविता
मैं भी लिख सकता हूं कविता।

नृत्य-नाच और अक्षि-आंख पर
पंच-पांच और लक्ष-लाख पर
चन्द्र-चांद और दंत-दांत पर
कर्म-काम और सप्त-सात पर
तत्सम-तद्भव की यह कविता
मैं भी लिख सकता हूं कविता।

Tuesday, October 25, 2011

अपने गुरुजनों को सादर समर्पित



गुरुजन अपने कितने प्यारे,
ब्रह्मा विष्णु शिवा हमारे,
खुद जलकर जीना सिखलाते,
जीवन राह दिखाने वाले,
मात पिता और सखा हमारे
गुरुजन अपने कितने प्यारे।

गुरु बिन ज्ञान नहीं मिलता रे,
ग्रन्थ पड़े रहते हैं सारे,
गुरु हमारे ज्ञान दीप हैं,
अन्धकार काटे हैं सारे।

सारे वन की कलम बनाकर,
सागर जल को बना के स्याही,
धरती को कागज करके भी,
गुरुगुन लिखते दुनिया हारी।

Sunday, April 10, 2011

मन की व्यथा



मन की व्यथा कहूं मैं किससे, कोई न अपना मीत यहां।
मन पंछी पिंजड़े के भीतर, इसे सुकूं अब मिले कहां।

मीठे फल के फेर में पड़ के, कर बैठा बस इतनी भूल।
समझ न पाया इस दुनिया को, यहां तो सब है सेमल फूल।

जब आया पिंजड़े के भीतर, आजादी को तब जाना।
जेल की चुपड़ी रोटी से, अच्छा है भूखे मर जाना।

एक बार का मरना अच्छा, आजादी का वरण करो।
पराधीन सपनेहुं सुख नाही, आज इसे स्मरण करो।

मानव बन मानव का बैरी, दिल पर चोट बहुत है करता।
यही सोच मैं बैठा हूं के, ऊपर वाला न्याय है करता।

सरी चोट सहूंगा दिल पे, घाव एक न दिखलाऊंगा।
मलिक तू सब देख रहा है, और किसी से न गाऊंगा।

ईश्वर तेरी लाठी में आवाज नहीं पर चोट बड़ी है।
इंतजार मैं करूंगा स्वामी, विषम घड़ी अब आन पड़ी है।

चित्र marypages.com से साभार

Thursday, January 13, 2011

एक दूजे के लिए हम बने थे नहीं


एक दूजे के लिए हम बने थे नहीं,
फिर भी प्यारा हमारा ये साथ रहा।
खुशियां बांटी हैं जीवन की मिलके सभी,
और दुख में भी तुम्हारा साथ रहा।

ये पता था हमें मिल सकेंगे नही,
फिर भी प्यारा सा इक एहसास रहा।
कच्ची डोरी से हम तुम बंधे ही नहीं
फिर भी बंधन का इक एहसास रहा।

दिल के रिश्ते हैं जो खुद ही जुड़ जाते हैं,
किसी बंधन का इनमें न भास रहा।
प्यार की डोर होती है पावन बड़ी,
इसकी मर्यादा का हमको भास रहा।

यादें दिल में बसी हैं रहेंगी सदा,
चाह कर भी न इनको भुला पाउंगा।
है यहीं मुझको ऐ मेरे प्यारे सनम,
होगे तनहाई में तो मैं याद आऊंगा।

जिन्दगी का सफर है ये लम्बा मगर
प्यार की यादों में ही गुजर जायेगा।
खुश रहो मेरे हमदम ओ मेरे सनम
दिल दुआ देगा हरदम ये दोहरायेगा।

Tuesday, October 5, 2010

कितना प्यार मुझे है तुमसे कैसे तुमको बतलाऊं


कितना प्यार मुझे है तुमसे कैसे तुमको बतलाऊं
हनूमान मैं नहीं प्रिये जो चीर कलेजा दिखलाऊं।

तुमको याद किया करता हूं मैं प्रतिपल आंहें भरता हूं
यकीं दिलाऊ कैसे तुमको प्यार बहुत मैं करता हूं।

होती जब भी बात तुम्हारी छुप-छुप कर मैं सुनता हूं
ना देखूं मैं जिस दिन तुमको पागल सा मैं लगता हूं।

प्रीत की रीत निभाऊं कैसे, मुझे नहीं है कुछ आता
बिन देखे अब चैन नहीं है, काश मैं तुमसे कह पाता।

आंखें तेरी हुई दिवानी, नहीं इन्हें हैं कुछ भाता
हर पल चाहें सूरत तेरी, दूजा कुछ भी नहीं सुहाता।

दिन में खोया-खोया रहता, नींद न आती रातों में
भरी चूड़ियां हरदम दिखतीं, मेंहदी वाले हाथों में।

हर आहट पे चौक मैं पड़ता मिलता मुझको आभास तेरा
दिल में उठती घोर निराशा जब न मिलता साथ तेरा।

खत मैंने हैं बहुत लिखे पर एक न तुमको भेज सका
डर लगता है पढ कर इनको, हो न जाओ कहीं खफा।

मैं देखूंगा बाट तुम्हारी, किया इरादा पक्का है
तुम भी मुझसे प्यार करोगी, प्यार मेरा गर सच्चा है।

चित्र  chennai.olx.in से साभार 

Thursday, September 30, 2010

मैं बापू से मिलकर आया

बापू और कस्तूरबा सेवाग्राम आश्रम में
विगत 16 सितम्बर 2010 को मुझे सेवाग्राम आश्रम वर्धा महाराष्ट्र जाने का सुयोग प्राप्त हुआ। मैं अपने को बड़ा भाग्यशाली समझता हूं कि मुझे बापू की कर्मस्थली सेवाग्राम में जाने का अवसर मिला। वहां पहुंच कर ऐसी आत्मीय शांति की अनुभूति हुई कि उसका वर्णन करने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है उसके विषय में केवल इतना कहना ही पर्याप्त है कि 'ज्यो गूंगे मीठे फल को रस अन्तर्गत ही भावे' वही स्थिति मेरी है। वहा पर मैं तो केवल इसलिए गया कि सेवाग्राम आया हूं तो बापू का आश्रम भी घूम ही लेता हूं। लेकिन वहां जाकर पता चला कि यह तो एक परम पावन तीर्थ है जहां प्रत्येक भारतवासी या जो सत्य की तलाश करना चाहते हैं उन्हें कम से कम एक बार तो अवश्य ही आना चाहिए। वहां जाने से पहले मैं बापू को गांधी जी कहता था लेकिन वहां जाकर पता चला कि वे गांधीजी नही थे वरन बापू ही थे। मुझे लगता है कि वहां जाकर मुझे बापू का साक्षात्कार हो गया है हो सकता है ऐसा कुछ न हुआ हो या यह मेरे दिमाग  में हुए किसी 'केमिकल लोचा' का परिणाम हो। चाहे जो हो मैं वहां पहुंचकर अपने को धन्य समझता हूं। और मैंने पहली बार बापू को इतने करीब से देखा और जाना। मुझे दुख है कि हमारी शैक्षिक संस्थाएं बच्चों को ऐसे स्थानों पर क्यों भ्रमण नहीं करवाती जहां पर उन्हें सत्य का साक्षात्कार स्वतः ही हो सकता है।  मुझे इस बात का भी दुख है कि मैं अब तक इस महापुरुष से इतना अपरिचित कैसे रहा जिसका दुनिया लोहा मानती है। शायद इसका कारण घर की मुर्गी दाल बराबर होना हो। तमाम मलाल, दुख, हर्ष, पश्चाताप और न जाने किन-किन भावों के साथ बापू को समर्पित मेरी कुछ पंक्तियां आपके सम्मुख प्रस्तुत हैं :-


मैं बापू से मिलकर आया, सेवाग्राम के आश्रम में।
देख मुझे वे बहुत खुशी थे, लेकिन हलचल थी मन में।
पास बैठ जब मैंने देखा, दुखी बहुत थे अन्तर्मन में॥

मैंने पूछा बात क्या बापू, कुछ मुझको बतलाओ तो,
ऐसी भूल हुई क्या बापू राह मुझे दिखलाओ तो।
पहले बापू मुस्काए फिर बाले ऐ वत्स मेरे -
प्रयोग पड़ा है अभी अधूरा सत्य पहेली सुलझे ना।
देख रहा मैं बच्चे मेरे सत्य राह से भटके ना।
पहले राह सरल थी लेकिन अब है दुविधा आन पड़ी।
झूठ ने पहना 'सत्य मुखौटा', बनी मुसीबत राह खड़ी।
बच्चे मेरे भटक न जायें, सोच-सोच घबराता हूं।
यही व्यथा मेरे अन्तर्मन में, कोई राह न पाता हूं।

मैं बोला अब बापू मेरे संशय अपना दूर करो।
हृदय 'दिया' है मेरा बापू, इसे तुरत स्वीकार करो।
जोत जला दो इसमें ऐसी प्रतिपल ही मैं जलता जाऊं।
खुद जलकर के इस जग में मैं सत्य पथिक को राह दिखाऊं॥
सत्य पथिक को राह दिखाऊ॥

चित्र ruraluniv.ac.in से साभार

Monday, September 27, 2010

भगवन तू है बहुत महान

मां विरासनी देवी बिरसिंहपुर पाली उमरिया म०प्र०


भगवन तू है बहुत महान,
देता रहता सबको ज्ञान।
अज्ञानी हम समझ न पाते,
करते हैं झूठा अभिमान॥

मन के भीतर तेरा धाम,
देख रहा तू सबके काम।
बुरे काम करते जब भी हम,
मन तो हमको रोके हर-दम॥

फिर भी तुझको हम झुठलाते,
अन्तकाल बैठ पछताते॥

अनन्त नाम हैं तेरे स्वामी,
क्या जानें हम मूरख खल-कामी।
जिसने मन से तुम्हें पुकारा,
हुआ है उसका वारा न्यारा॥

आया हूं अब शरण तुम्हारी,
मुझ पर कृपा करो दुखहारी।
नित्य सत्य के मार्ग चलूं मैं
अभिमानों से बचा रहूं मैं॥

करूं राष्ट्र की सेवा इतनी,
'जगद्‌गुरु' का पद दिलवाऊं।

मार्ग कठिन है अन्धकारमय,
ज्ञान ज्योति दो मन के भीतर।
जगत के आऊं काम प्रभू मैं,
भीतर-बाहर हो प्रकाशमय॥

Friday, September 24, 2010

कहां गया वह प्यार तुम्हारा


कहां गया वह प्यार तुम्हारा
जिस पर मैंने सब कुछ वारा
छीन लिया है दिल का सहारा
फिरता हूं मैं मारा मारा
कहां गया वह प्यार तुम्हारा॥

कहां गयी वो प्यार की बातें
प्यार और टकरार की बातें
प्यार-प्यार में धर्म की बातें
धर्म और दर्शन की बातें
प्रेम, काम और मोक्ष की बातें
बातों में बातों की बातें
बातों में कटती थी रातें
कहते थे सब आते जाते
जाने क्या करते ये बातें ?

'हे मेरी तुम'
प्यार नहीं है सांप की केचुल
जो छोड़ा और भूल गये
क्यों तुम मुझको भूल गयी ?
क्या तुम सचमुच में भूल गयी ?

हां तुम मुझको भूल गयी
पर...
मैं न तूमको भूल सका।
मैं न तुमको भूल सका॥

चित्र japaninc.com से साभार

मुझको कविता नहीं है आती


मुझको कविता नहीं है आती
मैं तो केवल लिखता पाती।

जो कुछ मेरे मन में आता
जो कुछ मेरे मन को भाता
जो है मेरी थाती
मैं तो केवल लिखता पाती।

रस छन्द औ अलंकार का ज्ञान नहीं है
कितनी मात्रा कहां लगेगी
भान नहीं है
जो कुछ भी आ जाता मन में,
लिख देता हूं।
इसी से अपने पागल मन को
बहला लेता हूं।
यह कहने में मुझको देखो
शर्म तनिक न आती
मुझको कविता नहीं है आती
मैं तो केवल लिखता पाती॥

चित्र communities.canada.com से साभार

Thursday, September 23, 2010

कैसा है यह सतीत्व तेरा






एक पति है मन के भीतर, एक है तेरा घरवाला।


प्रीत की रीत निभाई किससे, भड़काई उर अन्तरज्वाला॥
आज बनी है वधू किसी की, बैठी है वो ओढ  दुशाला॥


पति तो केवल एक ही होता, मन से वरण किया है जिसका।
बाकी सब है दुनियादारी, कौन हुआ है यहां पे किसका॥


प्रीत की डोर बहुत नाजुक है, ऐसे इससे मत खेलो।
डोर के टूटे दिल टूटेगा, दो-दो दिल से ना खेलो॥


सच का सामना कठिन है फिर भी, झूठ बोलना नहीं सरल।
कुछ करने से पहले सोचो, आगे फिर क्या होगा कल॥


प्रेम नहीं है सांप की केचुल, छोड  दिया और भूल गये।
जीवन भर तड पोगे तुम भी, कभी न तुमको आये कल॥


तोड  दिया दिल मेरा तुमने, बाप की आन बचाने को।
पोत दी मेरे मुख पे कालिख, मैं क्या बतलाऊं जमाने को॥


जिसके गर्व बहुत करता था, आज वो मुझसे हुई जुदा।
प्रीत निभाई ठोकर खाई, कैसी किस्मत मिली खुदा॥


कसम खुदा की मैं कहता हूं, मुझको भूल न पाओगे।
बेशक संग सजन के होगे, मन में हमें ही पाओगे॥


जब आयेगी हिचकी तुमको, भ्रम मत करना साजन का।
जब तक नाम न मेरा लोगे, छुटकारा न पाओगे॥


दिल के टूटे शोर न होता, पर दर्द बहुत ही होता है।
दुनिया जब है जश्न मनाती, ये अन्दर-अन्दर रोता है॥


चित्र  


topnews.in 


से साभार

हाय रे किस्मत खोटी मेरी


हाय रे किस्मत खोटी मेरी, प्रियतम मेरा रूठ गया।
प्रेम का कच्चा धागा था जो, एक पल में ही टूट गया॥

प्रियतम मेरा गया वहां पे, जहां से कोई लौटे ना।
ऐसी सजा मिली है मुझको, अब तो पल-पल मुझको खटना॥

जनम-जनम तक साथ का वादा, कहां गया ऐ प्रीत मेरे।
मन की बातें मन में ठहरीं, किसे सुनाऊं गीत मेरे॥

तेरी भी गलती क्या यारा, रब ही जब हो गया खफा।
प्रेम तो होता अक्स खुदा का, फिर कैसे कर दिया जुदा॥

गलती तो कुछ हुई है मुझसे, जो मुझको मिल रही सजा।
कष्ट दिया था औरों को और जीवन का था लिया मजा॥

जुर्म कुबूल मुझे हैं सारे, काटी मैंने बड़ी सजा।
यही गुजारिश अब है मौला, मुझको अपने पास बुला॥

नहीं सहा जाता अब मुझसे, प्रियतम का यह दुख बड़ा।
मुझको अपने पास बुला ले, तेरा दिल है बहुत बड़ा।

चित्र dorsetwebdesigns.com से साभार

Sunday, September 5, 2010

तुम्हीं से प्यार करता था, तुम्हीं को प्यार करता हूं।


तन्हा हो के भी मैं कभी तन्हा नहीं होता,
लम्हा कौन सा ऐसा के मेरा दिल नहीं रोता॥

तुम्हारी याद आती है औ पलकें भीग जाती हैं,
रहूं महफिल या वीरां में उदासी छा ही जाती है॥

कहूं किससे मैं हाले दिल, यहां अपना नहीं कोई,
जिसे अपना समझता हूं वो मुझको छोड़ जाते हैं॥

ये जालिम इश्क है कैसा, सबब इसका यही होता,
जिसे हम प्यार करते हैं, वो हमको भूल जाता है॥

तमन्ना है यही दिल में के जब होऊं मैं कफन ओढ़े,
जनाजे में वो आ कर के, दामन को भिगो जाये॥

निशानी कुछ नही मेरी, कहानी कुछ नहीं मेरी,
सिले हैं होठ भी मैंने, निगाहें बन्द करता हूं॥

जनाजे पे चली आना, यही फरियाद करता हूं।
नहीं खवाहिश बची कुछ भी, तुम्हीं को याद करता हूं।
तुम्हीं से प्यार करता था, तुम्हीं को प्यार करता हूं।


चित्र  dreamformypeople.blogspot.com से साभार।

Saturday, August 14, 2010

मत आओ अब सपने मे


क्यों आते हो सपनों में, जब हमको तनहा छोड़ दिया।
प्रेम की कच्ची डोरी को, एक पल में झट से तोड  दिया॥

देख लिया है प्यार तुम्हारा, अब नहीं धोखा खाऊंगा।
जब आओगे सपने में, मैं फौरन ही जग जाऊगा॥

सपने झूठे होते हैं, बस झूठी तस्वीर दिखाते हैं।
नहीं हो सकता संभव जो, वो उसको कर दिखलाते हैं॥

वाह री किस्मत मेरी, मैंने अब तक धोखा खाया है।
इस दुनिया में जिसको चाहा, उससे ही दुख पाया है॥

यही सबब है प्यार का यारों, यार नहीं मिल पाताहै।
बस मिलती है उसकी यादें, जीवन भर तड पाती हैं॥

आते हैं सुख सपने इतने, जीवन की राह भुलाते हैं।
यही हुआ है जगत में हरदम, प्रेमी मिल नहीं पाते हैं॥

शिकवा नहीं गुजारिश तुमसे, मत आओ अब सपने में।
बेगाना कर छोड  दिया जब, मत गिनवाओ अपने में।

मत आओ अब सपने में, मत आओ अब सपने में॥

Tuesday, December 29, 2009

सरकारी क्षेत्र के असरकारी कर्मचारी- भाग-२


आज के समय में सरकारी क्षेत्र के अ-सरकारी कर्मचारियों की संख्या में काफी इजाफा हो गया है और समय के साथ-साथ यह संख्या बढ़ती ही जा रही है। इन अ-सरकारी कर्मचारियों की संख्या बढ़ने का एक और कारण देश में व्याप्त होता भ्रष्टाचार भी है जिसके चलते अधिकारी वर्ग अपने पद की प्रतिष्ठा और गरिमा बचा पाने में असमर्थ प्रतीत हो रहे हैं इसका परिणाम यह होता है कि उनके अन्दर सत्य की शक्ति का अभाव होने के कारण वे अपने अधीनस्थों को किसी गलत काम को करने न तो रोक ही पाते हैं और न ही उन पर प्रभावी नियंत्रण ही रख पाते हैं। ऐसी स्थिति में अधिकारी बनाम कर्मचारी का युद्ध सदैव चलता रहता है। इस युद्ध की स्थिति में अधिकारी अपना एक विश्वासपात्र अ-सरकारी कर्मचारी नियुक्त कर लेता है और उससे वे सब सरकारी काम करवाता है जो कि उसे लगता है कि सरकारी कर्मचारी से करवाने से गोपनीयता भंग हो सकती है। मतलब तो आप समझ ही रहे होंगे।
कुछ-कुछ विभागों में तो यह देखा गया है कि अधिकारी अ-सरकारी कर्मचारी को नियुक्त करने को एक स्टेटस सिम्बल के रूप में देखते हैं। जैसे ही वे किसी कार्यालय में पहुंचते हैं वहां की अव्यवस्थाओं से खिन्नता जाहिर करते हुए अपने किसी अ-सरकारी आदमी को नियुक्त कर लेते हैं। सामान्यतया ये अ-सरकारी कर्मचारी उनके अति विश्वासपात्र होते हैं जिनके बलबूते वे अपनी सत्ता चलाते हैं।
कहीं-कहीं अधिकारी वर्ग इन अ-सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति मजबूरी में भी करते हैं। कई ऐसे कार्यालय भी हैं जहां विभागाध्यक्षों की लापरवाही, लोभ, सत्तालोलुपता, भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता के कारण अधिकारी-कर्मचारी सम्बन्धों पर बड़ा प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। ऐसे कार्यालयों में अधिकारी कर्मचारी के नियंत्रण में नहीं रहना चाहते हैं। ऐसे में अधिकारियों को तब बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है जब उन्हें समयान्तर्गत किसी कार्य को पूर्ण करना हो या समय से कोई सूचना शासन को पहुंचानी हो। ऐसे अवसरों पर अधिकारियों को कर्मचारियों की बड़ी अनुनय-विनय करते देखा जा सकता है क्योंकि शासन की बैठकों में अधिकारी को ही उपस्थित होना होता है। इन विपरीत परिस्थितियों में ये अ-सरकारी कर्मचारी बड़े काम के मोहरे साबित होते हैं। अ-सरकारी कर्मचारी सरकारी कर्मचारियों की तुलना में सामान्यतया अधिक योग, कुशल, दक्ष एवं प्रशिक्षत होते हैं। सरकारी कर्मचारियों की तुलना में इनमें केवल अनुभव की कमी होती है जो कि धीरे-धीरे एक-दो साल में ये ग्रहण कर लेते हैं। कहीं-कहीं तो यह भी देखा गया है कि ये अ-सरकारी कर्मचारी सरकारी कर्मचारियों से भी ज्यादा असरकारी यानी कि प्रभावशाली स्थान बना चुके हैं। कई विभाग तो ऐसे हैं जहां का अधिकतम काम इन अ-सरकारी कर्मचारियों के भरोसे ही हो रहा है। अ-सरकारी कर्मचारियों की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता है।
ऐसा कहना सत्य नहीं होगा कि अ-सरकारी कर्मचारी केवल सरकारी धन के दुर्विनियोग के प्रयोजन से नियुक्त किये जाते हैं। बल्कि सत्य तो यह है कि इनकी नियुक्ति समय की जरूरत है और इससे सिस्टम को एक नया रूप मिला है। यदि सरकार इन अ-सरकारी कर्मचारियों पर कोई अध्ययन कराये तो उसे देश एवं प्रदेश में व्याप्त एक बहुत बड़ी समस्या और उसका समाधान ये अ-सरकारी कर्मचारी मुहैया करा सकते हैं। सरकार जनता की सेवा के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति करती है और जनता की हमेशा यह शिकायत रहती है कि कर्मचारी सही से काम नहीं करते। किन्तु जहां-जहां ये अ-सरकारी कर्मचारी नियुक्त हुए हैं वहां व्यवस्था में कुछ न कुछ परिवर्तन अवश्य आया है जिसे हम इन अ-सरकारी कर्मचारियों की उपयोगिता के रूप में रेखांकित कर सकते हैंे। अ-सरकारी कर्मचारियों की कुछ उपयोगिता या व्यवस्था में उनके योगदान को निम्नलिखित रूप में देखा जा सकता है-
१. सामान्यतया यह देखा गया है कि एक अ-सरकारी कर्मचारी सरकारी कर्मचारी की तुलना में अधिक निष्ठा, कार्यकुशलता, लगन, मेहनत एवं ईमानदारी से काम करता है। इसका कारण स्पष्ट है कि उसे यह पता होता है उसकी यह काबिलियत ही उसे किसी सरकारी कार्यालय में स्थापित बनाये रख सकती है। यही वह एक चीज की कमी इस कार्यालय में थी जिसकी पूर्ति के लिए उसे लाया गया है और सबसे बड़ी बात यह कि यदि उसने इन मानकों का पालन नहीं किया तो किसी भी समय उसे उसकी सेवाओं से हटाया जा सकता है। तो क्या इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि सरकारी कर्मचारियों के कथित निकम्मेपन का कारण उनकी सेवाओं की स्थायी प्रकृति का होना है? २. सीमित साधनों में अधिकतम उत्पादकता का प्रयास - अ-सरकारी कर्मचारियों में यह गुण पाया जाता है कि वे व्यवस्था में व्याप्त कमियों के कारण न-नुकुर न करके केवल काम पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं। वे विषम से विषम परिस्थितियों में काम करने को तत्पर रहते हैं। क्योंकि उनके मन में कहीं न कहीं यह बात जरूर होती है कि मुझे अपने काम से मतलब है न कि पूरे कार्यालय की व्यवस्था से। ३. दुष्प्रेरकों से प्रभावित न होना - मेरे हिसाब से हर वह व्यक्ति जो अपने प्रभाव से किसी कर्मचारी को उसके सामान्य कार्य से बहकाये वह दुष्प्रेरक है। सामान्यतया अ-सरकारी कर्मचारी दुष्प्रेरकों के प्रभाव से रहित होते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी नियुक्ति और पदच्युति में इन कथित दुष्प्रेरकों की कोई भूमिका नहीं रहती है। ४. कार्यों को अधिक कुशल सम्पादन - अ-सरकारी कर्मचारी सरकारी कार्यालय के किसी कार्य पर अपना अधिपत्य नहीं समझता और यही कारण है कि वह किसी काम को लटकाये नहीं रखना चाहता। इसका परिणाम यह होता है कि कार्य निर्बाध गति से अनवरत चलता रहता है। ५. अ-सरकारी कर्मचारी कम खर्चीले होते हैं- जहां एक सरकारी कर्मचारी को पन्द्रह से बीस हजार रूपये तनख्वाह पर रखकर भी कार्य करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता वहीं अ-सरकारी कर्मचारी महज तीन से छ: हजार में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। सरकारी कर्मचारी की तुलना में अधिक कुशलता से कार्य का निष्पादन करते हैं और इनका मनमाना उपयोग भी किया जा सकता है। सस्ता भी बढ़िया भी। ६. नियुक्ति प्राधिकारी के प्रति पूर्ण निष्ठा - अ-सरकारी कर्मचारी अपने नियुक्ति प्राधिकारी के प्रति पूर्ण निष्ठावान पाये जाते हैं। यही कारण है कि ये अन्य अधिकारियों का प्रभावशाली कर्मचारियों के दबाव में नहीं आते हैं। ये न तो किसी आन्तरिक न तो किसी वाह्य अधिकारी के ही दबाव में आते हैं। इस कारण से भी कार्य को कुशल सम्पादन अनवरत गति से चलता रहता है। ७. यूनियनों और कर्मचारी संगठनों से प्रभावित नहीं होते - चंूकि ये अ-सरकारी कर्मचारी किसी यूनियन अथवा कर्मचारी संगठन के सदस्य नहीं होते हैं इसलिए ये इन संगठनों और यूनियनों के प्रस्तावों के द्वारा भी प्रभावित नहीं होते हैं। ८. समय की बचत - अ-सरकारी कर्मचारी अपने पास किसी काम को अधिक समय तक लम्बित नहीं रखना चाहते और यदि कोई जटिल समस्या उनके सामने आती है तो वे उस समय तकनीकी का अधिकतम उपयोग कर उसे सरलतम रूप में परिवर्तित कर लेते हैं। वे किसी सरकारी ढर्रे पर चलने के आदी नहीं होते हैं।
अ-सरकारी कर्मचारियों से केवल लाभ ही होता हो, ऐसा नहीं है। इनके द्वारा विभागों को कुछ हानियां भी हैं। अ-सरकारी कर्मचारियों की सामाजिक और आर्थिक जिन्दगी से हम आगे की पोस्टों में परिचित होंगे।

Saturday, December 26, 2009

सरकारी क्षेत्र के असरकारी कर्मचारी...........



   एक समय हुआ करता था जब कि हम किसी से परिचय प्राप्त करते समय उससे पूंछा करते थे कि आप किस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं तो उसके जवाब के लिए उसके पास केवल दो विकल्प ही होते थे या तो वह कहता था कि वह सरकारी क्षेत्र में काम करता है या कहता था कि प्राइवेट सेक्टर में काम करता है। परन्तु आज के तकनीकी युग में जिस प्रकार से नयी-नयी तकनीकियों का आविष्कार हो रहा है उसी तरह से इन क्षेत्रों में भी एक नये क्षेत्र का भी उद्भव पिछले कुछ वषों में हुआ है, और उस नये क्षेत्र के कर्मचारी हैं- सरकारी क्षेत्र के असरकारी कर्मचारी। चौंकिये नहीं! यह असरकारी शब्द सरकारी क्षेत्र के प्रभावशाली कर्मचारियों की श्रेणी नहीं है बल्कि यह उन कर्मचारियों की श्रेणी है जो अ-सरकारी हैं और सरकारी क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। 
  जिन लोगों का सरकारी कार्यालयों से दूर-दूर तक नाता नहीं होगा उन्हें शायद मेरी बात पर आश्चर्य भी हो रहा होगा कि वास्तव में कर्मचारियों की ऐसी भी श्रेणी हो सकती है, लेकिन वे लोग जो सरकारी कार्यालयों से सम्बन्धित हैं वे इन नयी श्रेणी के कर्मचारियों से भली-भांति परिचित होंगे। असरकारी कर्मचारी जैसा कि इनके नाम से ही पता चलता है कि ये सरकारी नहीं होते अत: इनकी नियुक्ति, उपस्थिति, भुगतान, कार्य की शर्तें आदि किसी सरकारी कागज पर लिखित रूप में नहीं होती हैं वरन् इन्हें आपसी समझ-बूझ के आधार पर नियुक्त कर लिया जाता है, और ये नियोक्ता के प्रसाद पर्यन्त अपनी सेवाएं प्रदान करते रहते हैं। 
  अब प्रश्न यह उठता है कि जब सरकारी क्षेत्र में कर्मचारियों की संख्या इतनी अधिक है कि सरकार को समय से वेतन देने में भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है तो फिर इस तरह के कर्मचारियों का क्या औचित्य। इन असरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति के कारणों के रूप में आज की तकनीकी और खास-तौर पर कम्प्यूटर को दोष दिया जा रहा है।  
 सरकार ने असरकारी क्षेत्र को देखते हुए विचार किया कि यदि सरकारी कार्यालयों में कम्प्यूटर मुहैया करा दिया जाय तो ई-गवर्नमेंट की राह आसान हो जायेगी और सरकारी कामकाज के ढर्रे में भी सुधार आयेगा तथा समय से सूचनाएं शासन के पास उपलब्ध रहेंगी। बस सरकार ने आव देखा न ताव धड़ाधड़ कम्प्यूटर खरीदे जाने लगे और सरकारी कार्यालयों में स्थापित किये जाने लगे। लेकिन सरकार से यहीं चूक हो गयी। सरकार सरकारी कर्मचारियों को या तो प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं करा सकी, या तो प्रशिक्षण केवल कागजों पर ही संचालित होते रहे, या तो प्रभावी नियंत्रण के अभाव के कारण कर्मचारियों ने प्रशिक्षण में कोई रूचि नहीं ली। फलस्वरूप कर्मचारियों को प्रमाणपत्र तो मिल गया और उस प्रमाणपत्र के साथ उन्हें मिलने वाला टंकण भत्ता अब कम्प्यूटर भत्ता में भी बदल गया किन्तु वे आज भी अपने को कप्यूटर निरक्षर ही बताते हैं। फलस्वरूप कम्प्यूटर या तो डिब्बे में ही बन्द रहे, या अधिकारियों के बच्चों के लिए उनके घरों में चोरी छिपे स्थापित कर दिये गये या फिर जरूरत महसूस की जाने लगी कि किसी असरकारी व्यक्ति की सेवाएं ली जाएं।
   असरकारी कर्मचारियों की उत्पत्ति में यह मान लिया जाय कि सरकारी कर्मचारियों ने कम्प्यूटर प्रशिक्षण नहीं लिया इसलिए असरकारी कर्मचारी इस क्षेत्र में आये तो यह भी पूर्णतया सत्य नहीं है। आजकल विभागों में विभागाध्यक्षों में सत्य की शक्ति न होने के कारण उनका अधीनस्थों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रहा। उसका परिणाम यह हुआ कि आज के विभागाध्यक्ष अपने अधीनस्थों को कड़ाई से कम्प्यूटर के प्रयोग के लिए बाध्य नहीं कर सके। प्रभावी नियंत्रण का अभाव न होने के कारण वे सरकारी कर्मचारी जो कम्प्यूटर के प्रति खासा उत्साहित थे अन्तत: वे हार गये और उन्होंने धीरे धीरे अपने को तकनीकी निरक्षर साबित करने में ही भलाई समझी। आप सोच रहे होंगे कि जो व्यक्ति एक बार कम्प्यूटर पर काम कर ले वह कम्प्यूटर के मोह से कैसे बच सकता है, यानि कि वह अपने को कम्प्यूटर निरक्षर भला क्यों कर साबित करेगा। इसका कारण मैं आपको समझाता हूं। श्रीमान क जो कि एक सरकारी कर्मचारी हैं, ने अपने अन्य सहयोगियों के साथ ही कम्प्यूटर प्रशिक्षण प्राप्त किया, चूंकि वे कम्प्यूटर के आने से व्यवस्था में होने वाले बदलाव के प्रति खासे उत्साहित थे इसलिए उन्होंने प्रशिक्षण को बड़ी निष्ठा व लगन से पूर्ण किया। प्रशिक्षण के बाद श्रीमान क ने अपना कार्यालयीय काम कम्प्यूटर पर करना प्रारम्भ कर दिया जबकि उनके अन्य साथी कर्मचारी या तो कम्प्यूटर पर गेम खेलते या इस तलाश में रहते कि श्रीमान क थोड़ा सा खाली हों तो उनका काम भी निपटा दें। शुरू में श्रीमान क ने यह सोचते हुए कि ये कम सीख पाये हैं इसलिए मदद करने की भावना से उनके कामों को निपटाते रहे। धीरे-धीरे उनके साथी कर्मचारियों ने श्रीमान क के इस नेक इरादे का फायदा उठाते हुए, इसे अपना हक समझ लिया। अब श्रीमान क की स्थिति यह हो चुकी थी कि उनके अन्य साथी उनके अधिकारी के समान उन्हें काम सौंप कर चाय पीने चले जाते और श्रीमान क घण्टों बैठकर दूसरों के काम निपटाते। यह स्थिति बहुत ही निराश करने वाली होती है कि आप जिस व्यक्ति के लिए परेशान हो रहे हों वह कहीं बाहर जाकर चाय पी रहा हो या कस्टमर सेट कर रहा हो। अन्तत: श्रीमान क ने इस तरह काम करने से हाथ खड़े कर लिये। साथी कर्मचारी जो कि पहले बड़ी मीठी-मीठी बातें किया करते थे अब उन्हें घमण्डी, लोभी और न जाने किन-किन सम्बोधनों से सम्बोधित करने लगे। अगर बात यहीं तक सीमित होती तब भी गनीमत थी। श्रीमान क के अपने काम तक ही सीमित रह जाने के कारण या अतिव्यस्तता के कारण अन्य साथी कर्मचारियों के कार्य में बाधा पहुंचने लगी। जब अधिकारी ने सम्बन्धित को फटकार लगाई तो उनसे अपने आप को निर्दोष बताते हुए कहा कि साहब क्या करें श्रीमान क कुछ काम हीं नहीं करना चाह रहे हैं हमेशा फाइलें लटकाये रखते हैं न जाने क्या चाहते हैं? ऐसी शिकायत कई लोगों से मिलने के बाद एक दिन श्रीमान क को अधिकारी के सामने पेश किया गया और उस दिन अधिकारी के द्वारा उनके कम्प्यूटर प्रशिक्षण और उनके कम्प्यूटर के प्रति उत्साह का जो परिणाम मिला कि श्रीमान क ने अपने को कम्प्यूटर निरक्षर मान लेने में ही भलाई समझी। अधिकारी के द्वारा साथी कर्मचारियों को कम्प्यूटर पर कार्य करने के लिए बाध्य करने के बजाय श्रीमान क को फटकार लगाना क्या उचित है? क्या यह श्रीमान क के काम के प्रति निष्ठा को प्रभावित नहीं करता? यह कहां तक उचित है कि श्रीमान क को केवल इस बात के दण्डस्वरूप कि वे कम्प्यूटर साक्षर हैं और कुशल कम्प्यूटर संचालक हैं, वे अपने काम के साथ साथ अन्य साथी कर्मचारियों का काम भी अकेले ही करें? बेहतर तो तब होता जब अधिकारी अन्य साथियों से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए कह देता। कुछ वर्ष पहले जब बैंकों का कम्प्यूटरीकृत हुआ था तो बहुत से कर्मचारी ऐसे थे जो कि कुछ ही वर्षों में सेवानिवृत्त होने वाले थे वे नये सिस्टम में काम नहीं करना चाहते थे लेकिन बैंक ने क्या किया? या तो काम करो या तो सेवानिवृत्ति ले लो। बस फिर क्या था सारे कर्मचारी कम्प्यूटर पर काम करने लगे और आज कर्मचारी भी नयी तकनीकी के प्रयोग से खुश है और ग्राहक भी संतुष्ट हैं। देश को कोषागारों का कम्प्यूटरीकृत किया जाना अपने-आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है और प्रभावी नियंत्रण का एक नायाब नमूना भी। साथी ही यह उनके सवालों का भी जवाब है जो कि कहते हैं कि सरकारी क्षेत्र में नयी व्यवस्थाएं लागू ही नहीं हो सकती।
 इन सरकारी क्षेत्र के असरकारी कर्मचारियों से जुड़ी बहुत सी बातें मेरे मन में आ रही हैं लेकिन उन सबको एक की पोस्ट में डाल देना उचित नहीं प्रतीत हो रहा है। इस पोस्ट में हमने उनके उत्पत्ति के कारणों में से कुछ पर विचार किया। आगे हम उनके उद्भव एवं विकास के साथ साथ उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थितियों पर भी विचार करेंगे।