Friday, May 8, 2020

Winners Never Quit Quitters Never Win


अखंड भारत पब्लिक स्कूल। जी हां यह वही विद्यालय है जिसने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को आधार बनाया और इसके छात्र देश ही नहीं वरन विदेशों में भी अपनी सर्वोच्च सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। इस विद्यालय ने अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूरे कर लिए गए हैं जिस के उपलक्ष्य में स्वर्णिम जयंती समारोह का आयोजन किया जा रहा है। समारोह में देश-विदेश से हजारों की संख्या में पुरा छात्र एवं उनके परिवार एकत्रित हुए हैं जिसकी शोभा देखते ही बनती है। वैसे तो स्वर्णिम जयंती समारोह के उपलक्ष में अनेकानेक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है किंतु आज का कार्यक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज का कार्यक्रम पूर्णतया सैन्य सेवाओं को समर्पित है।

आपको बताते चलें कि इस विद्यालय में जितने छात्र विभिन्न सेवा में दिए हैं उससे कहीं ज्यादा छात्र रक्षा सेवाओं में अधिकारी के रूप में दिए हैं। यही कारण है कि आज का 1 दिन का कार्यक्रम रक्षा सेवाओं को समर्पित करते हुए आयोजित किया गया है आज का आयोजन अपने पूर्व नियोजित कार्यक्रमों के अनुसार ही संचालित हो रहा है। तभी अचानक भारत के थल सेना अध्यक्ष की ओर से एक संदेश प्राप्त हुआ है (जो स्वयं भी इस विद्यालय के पूरा छात्र हैं और कार्यक्रम में उपस्थित भी हैं) जिसके अनुसार कार्यक्रम में थोड़ा फेरबदल करना पड़ रहा है। थल सेना अध्यक्ष के निर्देशानुसार एक विशेष सभा का आयोजन किया जाना है जिसमें उनके बैच के एक पूरा छात्र विशेष सभा में समस्त वर्तमान छात्रों को संबोधित करेंगे। यह कार्यक्रम पूर्व में निर्धारित नहीं था इसलिए विद्यालय प्रशासन ऊहापोह की स्थिति में आ गया कि यह अचानक से ऐसा कार्यक्रम रखने की क्या आवश्यकता पड़ गई।

बहरहाल निर्देशानुसार निश्चित समय पर विशेष सभा का आयोजन किया गया। स्वयं थल सेनाध्यक्ष ने मुख्य वक्ता का परिचय सभा में उपस्थित समस्त सदस्यों को कराया। हालांकि उनके द्वारा कराया गया परिचय मुख्य वक्ता के हाव भाव से किसी भी तरह से मेल नहीं खाता था। थल सेना अध्यक्ष जी ने परिचय कराते हुए बताया कि श्री रमेश कुमार जी मुख्य वक्ता उनके समय के विद्यालय कप्तान रह चुके हैं साथ ही साथ पढ़ाई तथा अन्य शैक्षणिक गतिविधियों में भी अव्वल दर्जे के विद्यार्थी रहे हैं। क्योंकि आज का कार्यक्रम सैन्य अधिकारियों को समर्पित था इसलिए एक गैर सैन्य व्यक्ति का उद्बोधन कार्यक्रम के बीच में रखना किसी के गले नहीं उतर रहा था। सेनाध्यक्ष के द्वारा परिचय के उपरांत मुख्य वक्ता ने अपना वक्तव्य देना शुरू किया।

Winners never quit Quitters never win.
इन शब्दों के साथ श्री रमेश कुमार जी ने लड़खड़ाती आवाज में अपना उद्बोधन प्रारंभ किया। 

मेरी समझ में नहीं आता कि कहां से शुरू करूं। उन दिनों कक्षा ग्यारहवीं के बाद एनडीए में एंट्री हो जाया करती थी मैं अपने अन्य साथियों के साथ अपने प्रथम प्रयास में ही सफल रहा और एनडीए ज्वाइन किया। अपने विद्यालय में मैं हर क्षेत्र में अव्वल रहा आया था किंतु एनडीए पहुंचकर मुझे ज्ञान हुआ कि दुनिया वीरों से खाली नहीं है NDA में पूरे भारत के सर्वश्रेष्ठ छात्र प्रवेश प्राप्त करते हैं उन छात्रों को देखकर मैं धीरे-धीरे हीन भावना का शिकार होने लगा क्योंकि मैं सदैव अव्वल ही आना चाहता था जिसके लिए निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता होती है एनडीए पहुंचकर मैंने यह मान लिया कि मेरे जीवन का लक्ष्य पूरा हो गया है और अब मुझे आगे और मेहनत करने की आवश्यकता नहीं है यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी भूल साबित हुई। धीरे-धीरे मैं अपने अन्य साथियों से पिछड़ने लगा और हीन भावना मेरे अंदर घर करती गई। यह हीन भावना मेरे अंदर इतने गहरे में समा गई कि 1 दिन मैंने एनडीए छोड़ने का निश्चय कर लिया। मेरे इंस्ट्रक्टर ने मुझे बहुत समझाया और बहुत मौके दिए कि मैं अपने विचार को बदल दूं लेकिन मैं अपनी जिद पर अड़ा रहा और अंत में अपने माता पिता के सपनों को तिलांजलि देते हुए एनडीए छोड़ दिया। घर आकर मैंने अपने पिता से इंजीनियरिंग करने की इच्छा जाहिर की वैसे तो मेरे पिताजी एक मध्यम परिवार से आते थे किंतु उन्होंने आज तक मेरी हर इच्छा का सम्मान किया था और उन्होंने इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए मुझे सहर्ष अनुमति दे दी । इंजीनियरिंग में दाखिले के बाद मैंने देखा ऐसे बहुत से छात्र मुझे वहां मिले जो मुझसे जूनियर हुआ करते थे और वे आज मुझसे सीनियर है। फिर मेरे मन का भगोड़ा जाग उठा और मैंने इंजीनियरिंग भी छोड़ने का निश्चय कर लिया । किंतु इस बार मेरे पिता की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि वह मुझे खुले मन से सहयोग कर पाते उन्होंने मुझे बार-बार कहा कि बेटा केवल कुछ वर्षों की ही बात है पढ़ाई पूरी कर ले फिर जो करना होगा कर लेना। लेकिन मैंने एक न सुनी। 

समय हमेशा एक सा नहीं रहता। कुछ ही समय में पिताजी की मृत्यु हो गई।  पिताजी के मृत्यु के पश्चात घर की सारी जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई। उसी समय मुझे पता चला कि पिताजी ने अपनी समस्त पूंजी मेरी पढ़ाई पर खर्च कर दी थी जो कुछ बची कुची पूंजी थी जब मैंने एनडीए छोड़ी तो वहां के सारे खर्चे भरने में उन्हें जमा करनी पड़ी । उसके बाद मेरी इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ा जिसकी भरपाई भी आजीवन करते रहे और अंत में स्वर्ग सिधार गए । उनके स्वर्ग सिधारने के बाद मेरे ऊपर जिम्मेदारियों का पहाड़ टूट पड़ा। अब मैं चाह कर के भी समय को वापस नहीं ला सकता था। मैं सोचने लगा काश मैंने एनडीए न छोड़ा होता । काश मैंने इंजीनियरिंग ही कर लिया होता। लेकिन अब तो समय बीत चुका था । 

मैं इधर-उधर छोटी मोटी नौकरियों की तलाश में भटकने लगा लेकिन कहीं पर कुछ काम नहीं मिला और समय बड़ी कठिनाई से बीतने लगा। उस जमाने में तो आज के जैसे व्हाट्सएप फेसबुक सोशल मीडिया जैसी चीजें नहीं थी इसलिए मैं पूरी तरह से अज्ञातवास में चला गया। जैसे तैसे मुझे एक बैंक में छोटे से क्लर्क की नौकरी मिल गई और मेरा गुजारा चलने लगा लेकिन मेरे दोस्त हमेशा मेरे बारे में चिंतित रहा करते थे वह मुझसे संपर्क करना चाहते थे लेकिन मैं किसी ना किसी बहाने से उनसे बचने की ही कोशिश किया करता था मेरे अंदर की हीन भावना मुझे उनका सामना करने का साहस नहीं देती थी।

 किंतु आज जब विद्यालय का 50 वां स्थापना दिवस का समारोह था तो माननीय थल सेना अध्यक्ष जी ने मुझसे कहा की तुम्हारा अनुभव हमारे भावी छात्रों के लिए एक मार्गदर्शन का कार्य करेगा। मुझे भी लगा कि मैंने अपना जीवन व्यर्थ ही नष्ट कर दिया। हो सकता है कि मैं किसी बच्चे के भविष्य को बनाने के किसी काम आ सकूं। बस इतनी सी मेरी कहानी है और यही बताने के लिए मैं यहां आया था। मेरा सभी बच्चों को यही संदेश है कि हमें इस विद्यालय तक पहुंचाने में हमारे मां-बाप ने अथक परिश्रम किया है। उनके सपने पूरे करने की जिम्मेदारी हम सब की है। वह हमसे कुछ उम्मीद नहीं करते वह केवल हमारी सफलता देखना चाहते हैं । इसलिए मैं आप सबको यही समझाना चाहता हूं कि आप जीवन के लक्ष्य से कभी भी ना भटके। मैंने जो भूले की है वह आप अपने जीवन में कभी न करें मैंने अपने माता पिता के सपनों को चकनाचूर कर दिया जिसका दुख मुझे पूरे जीवन में रहेगा जिसकी भरपाई मैं चाह कर भी कभी नहीं कर सकूंगा लेकिन मैं चाहूंगा कि आप अपने जीवन में कभी भी ऐसी गलती ना करें और मेरा मूल मंत्र आप नोट करने की। Winners never quit Quitters never win.

रमेश कुमार जी के उद्बोधन के पश्चात सभा का समापन हुआ सभी छात्रों ने अपने मन में निश्चय कर लिया कि वे जहां तक संभव हो सके अपने माता पिता के सपनों को साकार करने की पूरी कोशिश करेंगे और साथ ही उन्होंने अपना मूल मंत्र बना लिया की Winners never quit Quitters never win.

Thursday, May 7, 2020

नो कास्ट नो रिलीजन नो गॉड No Cast No Religion No God

''नो कास्ट नो रिलीजन नो गॉड''

दो युवाओं के द्वारा ''नो कास्ट नो रिलीजन नो गॉड'' की मुहिम को आगे बढ़ाने की सराहना की जानी चाहिए।  इससे ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ हद तक हम समाज में व्याप्त जातिगत धर्मगत एवं पंथगत मतभेदों को मिटा सकेंगे, किंतु क्या वास्तव में यह ऐसा ही है जैसा सुनने में लगता है । 

पहले चर्चा करते हैं नो कास्ट पर । हिंदू मान्यता के अनुसार ऐसा माना जाता है कि जाति व्यवस्था ऋग्वेद कालीन है । वर्ण शब्द 'वृ' धातु से बना है जिसका तात्पर्य होता है वरण करना । प्रारंभ में यह व्यवस्था कर्म आधारित थी किंतु कालांतर में यह जन्म आधारित हो गई जो कि इस व्यवस्था का विकृत रूप कहा जा सकता है। अब यदि हम अपने दैनिक जीवन में विचार करें तो हम पाएंगे कि हम सभी अपने जीवन में वरण या वर्ग विभाजन करते हैं और हर वस्तु एवं व्यक्ति को वर्णों में विभक्त करते हैं यथा दोस्त, दुश्मन, अमीर, गरीब, रोजगार वाला, बेरोजगार, व्यापारी, भिखारी, राजनीतिक, वैज्ञानिक, अधिकारी, अधिवक्ता, शिक्षक, छात्र आदि आदि । विदेशों में भी हमें टेलर , वुड्समैन पेंटर आदि सरनेम देखने को मिलते हैं । और तो और जब हम अपने पहनने के लिए कपड़े खरीदते हैं तब भी उनका वर्ण विभाजन करते हैं , यथा यह समारोह वाला , यह रोज पहनने वाला, यह कार्यालय जाने वाला आदि । वर्ण व्यवस्था का विस्तृत स्वरूप हमें विज्ञान के क्षेत्र में आवर्त सारणी एवं जंतु वर्गीकरण के रूप में भी दिखाई देता है।

अब नो रिलिजन की चर्चा करते हैं।  हिंदू शास्त्रों के अनुसार जो धारण करने योग्य है वही धर्म है । यह धर्म की बहुत व्यापक परिभाषा है जो यह बताती है कि हम अपने जीवन में क्या धारण करते हैं । इस परिभाषा के अनुसार धर्म केवल मंदिर में जाकर यज्ञ अनुष्ठान करना नहीं है , वरन हर वह कार्य है जिसे हम संकल्प रूप में अपने जीवन में धारण करते हैं । धर्म का संबंध केवल पूजा पद्धति ना होकर हर वह क्रिया है जो किसी मत के अनुसार करणीय है । इस मान्यता के आधार पर हम यह भी कह सकते हैं कि हम यदि किसी धर्म को ना माने फिर भी हम धर्म विमुख न रह सकेंगे क्योंकि हर व्यक्ति जिस पेशे से जुड़ा है उस पेशे के सभी करणीय कार्य उसके धर्म का निर्माण करते हैं जैसे छात्र का छात्र धर्म , मानव का मानवता धर्म और तो और डॉक्टर ,वकील ,अभियंता ,अधिकारी ,पुलिस, कर्मचारी और सैनिक आदि का भी एक धर्म होता है जिसकी मर्यादा में रहकर उन्हे कार्य करना पड़ता है।

अब आते हैं अंतिम बिंदु यानी नो गॉड पर।  अनेक धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ईश्वर को नियंता के रूप में स्वीकार किया गया है जो इस संपूर्ण चराचर जगत का नियंत्रण करता है एवं संसार की समस्त शक्तियां ईश्वर द्वारा संचालित होती हैं। विश्व का एक वर्ग ऐसा भी है जो ईश्वर में बिल्कुल विश्वास नहीं करता फिर भी अपने जीवन की समस्त गतिविधियों को उसी प्रकार संचालित करता है जैसे एक आस्तिक व्यक्ति करता है। स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई जी ने तो नास्तिक को सबसे बड़ा आस्तिक माना है क्योंकि उसकी नास्तिकता में अटूट श्रद्धा होती है । ईश्वर को मानना या ना मानना किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अंग हो सकता है किंतु प्रायः देखा जाता है कि हर व्यक्ति किसी न किसी व्यक्ति को अपने आदर्श के रूप में स्वीकार करता है जिसके जैसा वह स्वयं बनना चाहता है और इसीलिए वह उसका अनुकरण भी करता है । यही धारणा ईश्वर का भी निर्माण करती है, ऐसा कहा जा सकता है । किंतु जब इस धारणा में अंधविश्वास, अंधानुकरण एवं अंधश्रद्धा का बोलबाला हो जाता है , तो व्यक्ति केवल अपनी ही सुनता है और अपनी ही बात सभी लोगों से मनवाना भी चाहता है और यही विकृत रूप ग्रहण कर लेती है और समाज के लिए घातक सिद्ध होती है।

सारांश रूप में हम यह कह सकते हैं कि इन दोनों युवाओं का प्रयास सराहनीय है किंतु हजारों वर्षों के अनुभव एवं ज्ञान को एक झटके में तिलांजलि दे देना क्या हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए न्याय संगत एवं हितकारी होगा इस पर भी विचार किया जाना आवश्यक है। समय की मांग है कि हम जागरूक बने एवं समाज के हर व्यक्ति को जागरूक करें, जिससे कि एक ऐसे समाज का निर्माण हो सके जिसमें हर व्यक्ति को व्यक्ति की गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार मिल सके।

Wednesday, May 6, 2020

फेक न्यूज़ क्या है ।। What is Fake News

Fake News

फेक न्यूज़ एक अंग्रेजी शब्द है जिसका हिंदी अनुवाद झूठी खबरें या मिथ्या समाचार है। संकुचित अर्थों में फेक न्यूज़ के अंतर्गत वह खबर सम्मिलित की जाती है जो कि सत्य नहीं है, किंतु इसके व्यापक अर्थ के अंतर्गत अनेक चीजों को सम्मिलित किया जा सकता है, जैसे तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करना, एकांगी दृष्टि से रिपोर्टिंग करना, तथ्यों की गहराई में ना जाना, बिना पुष्टि के आनन फानन में समाचार को आगे बढ़ा देना ।

यदि हम फेक न्यूज़ की उत्पत्ति पर प्रकाश डालें तो हमें यह ज्ञात होगा कि फेक न्यूज़ का चलन कोई नया नहीं है, वरन् यह बहुत ही पुराना है। राजा महाराजा के जमाने से चल रहा फेक न्यूज़ का धंधा प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध तक आते-आते बहुत व्यापक रूप में सामने आया। फेक न्यूज़ या प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल द्वितीय विश्व युद्ध में तकनीकी विकास के साथ राज्य प्रायोजित हुआ और खूब फला फूला ।

जैसे-जैसे संचार क्रांति का युग आया एक न्यूज़ के फैलने की गति भी बहुत तेज होती गई । पुराने समय में कोई फेक न्यूज़ अपनी धीमी रफ्तार के कारण जहां एक सीमित क्षेत्र को ही प्रभावित कर पाती थी , वहीं यह आज पूरे देश एवं विश्व को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।

एक सच्चे पत्रकार का नैतिक दायित्व है कि वह तटस्थ रहकर किसी खबर की हर दृष्टि से पड़ताल करें, समाचार की पुष्टि होने पर ही उसे आगे बढ़ाएं, जरा भी संदेह होने या विश्वस्त सूत्रों से पुष्टि न होने पर उसे आगे ना बढ़ाएं ।

वर्तमान समय सोशल मीडिया का युग है और इस समय ऐसे बहुत से माध्यम है जिसमें कोई भी व्यक्ति, जो कि प्रशिक्षित संवाददाता नहीं है, कहीं से भी कोई भी खबर सार्वजनिक कर सकता है। कभी-कभी यह फेक न्यूज़ किसी व्यक्ति, उत्पाद, समाज, धर्म , संप्रदाय, मान्यता आदि को निशाना बनाकर वायरल की जाती है, जिनके अत्यंत घातक परिणाम समाज को देखने को मिलते हैं । आज के समय में अनेक राजनीतिक पार्टियां अपना प्रचार एवं दूसरी पार्टी का दुष्प्रचार करने के लिए बाकायदा आईटी सेल का गठन कर प्रायोजित कार्यक्रम चला रही है।  इसी क्रम में एक देश दूसरे देश के विरुद्ध ऐसे कार्यक्रमों का संचालन कर रहे हैं जो कि पत्रकारिता के मानदंडों के बिल्कुल विपरीत है।

 आज के इंटरनेट के युग में किसी भी सूचना की सत्यता की पड़ताल करना अब उतना मुश्किल नहीं रह गया है, जितना कि पहले हुआ करता था। अतः सारांश रूप में यह कहा जा सकता है कि हम चाहे पत्रकार हों या आम नागरिक, हमारे पास आने वाली हर खबर को तभी आगे भेजें जब उसकी विश्वसनीयता की पड़ताल अपने स्तर से कर ले।खासतौर से उन खबरों के प्रति अत्यंत सचेत रहने की आवश्यकता है जो हमारे समाज एवं देश को तोड़ने का कार्य कर सकती हैं।

Tuesday, May 29, 2018

वैद्य जी की सेवा || Vaidya Ji Ki Sewa


(आभार - यह रचना मुझे Whatsapp पर प्राप्‍त हुईप्रेरक लगी तो ब्‍लाग पर पोस्‍ट कर दिया। लेखक का नाम अज्ञात है फिर भी मैं अज्ञात लेखक के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।)

एक पुरानी सी इमारत में था वैद्यजी का मकान था। पिछले हिस्से में रहते थे और अगले हिस्से में दवाख़ाना खोल रखा था।  उनकी पत्नी की आदत थी कि दवाख़ाना खोलने से पहले उस दिन के लिए आवश्यक सामान एक चिठ्ठी में लिख कर दे देती थी।  वैद्यजी गद्दी पर बैठकर पहले भगवान का नाम लेते फिर वह चिठ्ठी खोलते। पत्नी ने जो बातें लिखी होतीं, उनके भाव देखते, फिर उनका हिसाब करते। फिर परमात्मा से प्रार्थना करते कि हे भगवान ! मैं केवल तेरे ही आदेश के अनुसार तेरी भक्ति छोड़कर यहाँ दुनियादारी के चक्कर में आ बैठा हूँ।वैद्यजी कभी अपने मुँह से किसी रोगी से फ़ीस नहीं माँगते थे। कोई देता था, कोई नहीं देता था किन्तु एक बात निश्चित थी कि ज्यों ही उस दिन के आवश्यक सामान ख़रीदने योग्य पैसे पूरे हो जाते थे, उसके बाद वह किसी से भी दवा के पैसे नहीं लेते थे चाहे रोगी कितना ही धनवान क्यों न हो। 

एक दिन वैद्यजी ने दवाख़ाना खोला। गद्दी पर बैठकर परमात्मा का स्मरण करके पैसे का हिसाब लगाने के लिए आवश्यक सामान वाली चिट्ठी खोली तो वह चिठ्ठी को एकटक देखते ही रह गए। एक बार तो उनका मन भटक गया। उन्हें अपनी आँखों के सामने तारे चमकते हुए नज़र आए किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपनी तंत्रिकाओं पर नियंत्रण पा लिया। आटे-दाल-चावल आदि के बाद पत्नी ने लिखा था, "बेटी का विवाह 20 तारीख़ को है, उसके दहेज का सामान।" कुछ देर सोचते रहे फिर बाकी चीजों की क़ीमत लिखने के बाद दहेज के सामने लिखा, '' यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।''

एक-दो रोगी आए थे। उन्हें वैद्यजी दवाई दे रहे थे। इसी दौरान एक बड़ी सी कार उनके दवाखाने के सामने आकर रुकी। वैद्यजी ने कोई खास तवज्जो नहीं दी क्योंकि कई कारों वाले उनके पास आते रहते थे। दोनों मरीज दवाई लेकर चले गए। वह सूटेड-बूटेड साहब कार से बाहर निकले और नमस्ते करके बेंच पर बैठ गए। वैद्यजी ने कहा कि अगर आपको अपने लिए दवा लेनी है तो इधर स्टूल पर आएँ ताकि आपकी नाड़ी देख लूँ और अगर किसी रोगी की दवाई लेकर जाना है तो बीमारी की स्थिति का वर्णन  करें। वह साहब कहने लगे "वैद्यजी! आपने मुझे पहचाना नहीं। मेरा नाम कृष्णलाल है लेकिन आप मुझे पहचान भी कैसे सकते हैं? 
क्योंकि मैं 15-16 साल बाद आपके दवाखाने पर आया हूँ। 

आप को पिछली मुलाकात का हाल सुनाता हूँ, फिर आपको सारी बात याद आ जाएगी। जब मैं पहली बार यहाँ आया था तो मैं खुद नहीं आया था अपितु ईश्वर मुझे आप के पास ले आया था क्योंकि ईश्वर ने मुझ पर कृपा की थी और वह मेरा घर आबाद करना चाहता था। हुआ इस तरह था कि मैं कार से अपने पैतृक घर जा रहा था।
बिल्कुल आपके दवाखाने के सामने हमारी कार पंक्चर हो गई। ड्राईवर कार का पहिया उतार कर पंक्चर लगवाने चला गया। आपने देखा कि गर्मी में मैं कार के पास खड़ा था तो आप मेरे पास आए और दवाखाने की ओर इशारा किया और कहा कि इधर आकर कुर्सी पर बैठ जाएँ। अँधा क्या चाहे दो आँखें और कुर्सी पर आकर बैठ गया। ड्राइवर ने कुछ ज्यादा ही देर लगा दी थी। एक छोटी-सी बच्ची भी यहाँ आपकी मेज़ के पास खड़ी थी और बार-बार कह रही थी, '' चलो न बाबा, मुझे भूख लगी है। आप उससे कह रहे थे कि बेटी थोड़ा धीरज धरो, चलते हैं।मैं यह सोच कर कि इतनी देर से आप के पास बैठा था और मेरे ही कारण आप खाना खाने भी नहीं जा रहे थे। मुझे कोई दवाई खरीद लेनी चाहिए ताकि आप मेरे बैठने का भार महसूस न करें। मैंने कहा वैद्यजी मैं पिछले 5-6 साल से इंग्लैंड में रहकर कारोबार कर रहा हूँ। इंग्लैंड जाने से पहले मेरी शादी हो गई थी लेकिन अब तक बच्चे के सुख से वंचित हूँ। यहाँ भी इलाज कराया और वहाँ इंग्लैंड में भी लेकिन किस्मत ने निराशा के सिवा और कुछ नहीं दिया।"  आपने कहा था, "मेरे भाई! भगवान से निराश न होओ। याद रखो कि उसके कोष में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है। आस-औलाद, धन-इज्जत, सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु सब कुछ उसी के हाथ में है। यह किसी वैद्य या डॉक्टर के हाथ में नहीं होता और न ही किसी दवा में  होता है। जो कुछ होना होता है वह सब भगवान के आदेश से होता है। औलाद देनी है तो उसी ने देनी है। मुझे याद है आप बातें करते जा रहे थे और साथ-साथ पुड़िया भी बनाते जा रहे थे। सभी दवा आपने दो भागों में विभाजित कर दो अलग-अलग लिफ़ाफ़ों में डाली थीं और फिर मुझसे पूछकर आप ने एक लिफ़ाफ़े पर मेरा और दूसरे पर मेरी पत्नी का नाम लिखकर दवा उपयोग करने का तरीका बताया था। मैंने तब बेदिली से वह दवाई ले ली थी क्योंकि मैं सिर्फ कुछ पैसे आप को देना चाहता था। लेकिन जब दवा लेने के बाद मैंने पैसे पूछे तो आपने कहा था,  बस ठीक है। मैंने जोर डाला, तो आपने कहा कि आज का खाता बंद हो गया है। मैंने कहा मुझे आपकी बात समझ नहीं आई। इसी दौरान वहां एक और आदमी आया उसने हमारी चर्चा सुनकर मुझे बताया कि खाता बंद होने का मतलब यह है कि आज के घरेलू खर्च के लिए जितनी राशि वैद्यजी ने भगवान से माँगी थी वह ईश्वर ने उन्हें  दे दी है। अधिक पैसे वे नहीं ले सकते। मैं कुछ हैरान हुआ और कुछ दिल में लज्जित भी कि मेरे  विचार कितने निम्न थे और यह सरलचित्त वैद्य कितना महान है।
मैंने जब घर जा कर पत्नी को औषधि दिखाई और सारी बात बताई तो उसके मुँह से निकला वो इंसान नहीं कोई देवता है और उसकी दी हुई दवा ही हमारे मन की मुराद पूरी करने का कारण बनेंगी। आज मेरे घर में दो फूल खिले हुए हैं। हम दोनों पति-पत्नी हर समय आपके लिए प्रार्थना करते रहते हैं। इतने साल तक कारोबार ने फ़ुरसत ही न दी कि स्वयं आकर आपसे धन्यवाद के दो शब्द ही कह जाता। इतने बरसों बाद आज भारत आया हूँ और कार केवल यहीं रोकी है।वैद्यजी हमारा सारा परिवार इंग्लैंड में सेटल हो चुका है। केवल मेरी एक विधवा बहन अपनी बेटी के साथ भारत में रहती है। हमारी भान्जी की शादी इस महीने की 21 तारीख को होनी है। न जाने क्यों जब-जब मैं अपनी भान्जी के भात के लिए कोई सामान खरीदता था तो मेरी आँखों के सामने आपकी वह छोटी-सी बेटी भी आ जाती थी और हर सामान मैं दोहरा खरीद लेता था। मैं आपके विचारों को जानता था कि संभवतः आप वह सामान न लें किन्तु मुझे लगता था कि मेरी अपनी सगी भान्जी के साथ जो चेहरा मुझे बार-बार दिख रहा है वह भी मेरी भान्जी ही है। मुझे लगता था कि ईश्वर ने इस भान्जी के विवाह में भी मुझे भात भरने की ज़िम्मेदारी दी है।

वैद्यजी की आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गईं और बहुत धीमी आवाज़ में बोले, ''कृष्णलाल जी, आप जो कुछ कह रहे हैं मुझे समझ नहीं आ रहा कि ईश्वर की यह क्या माया है। आप मेरी श्रीमती के हाथ की लिखी हुई यह चिठ्ठी देखिये।" और वैद्यजी ने चिट्ठी खोलकर कृष्णलाल जी को पकड़ा दी। वहाँ उपस्थित सभी यह देखकर हैरान रह गए कि ''दहेज का सामान'' के सामने लिखा हुआ था '' यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।'' काँपती-सी आवाज़ में वैद्यजी बोले, "कृष्णलाल जी, विश्वास कीजिये कि आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि पत्नी ने चिठ्ठी पर आवश्यकता लिखी हो और भगवान ने उसी दिन उसकी व्यवस्था न कर दी हो। आपकी बातें सुनकर तो लगता है कि भगवान को पता होता है कि किस दिन मेरी श्रीमती क्या लिखने वाली हैं अन्यथा आपसे इतने दिन पहले ही सामान ख़रीदना आरम्भ न करवा दिया होता परमात्मा ने। वाह भगवान वाह! तू  महान है तू दयावान है। मैं हैरान हूँ कि वह कैसे अपने रंग दिखाता है।"

वैद्यजी ने आगे कहा, "जब से होश सँभाला है, एक ही पाठ पढ़ा है कि सुबह परमात्मा का आभार करो, शाम को अच्छा दिन गुज़रने का आभार करो, खाते समय उसका आभार करो, सोते समय उसका आभार करो।

Thursday, March 1, 2018

नालायक || Nalayak

(आभार - यह रचना मुझे Whatsapp पर प्राप्‍त हुईप्रेरक लगी तो ब्‍लाग पर पोस्‍ट कर दिया। लेखक का नाम अज्ञात है फिर भी मैं अज्ञात लेखक के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।)

देर रात अचानक ही पिता जी की तबियत बिगड़ गयी। आहट पाते ही उनका नालायक बेटा उनके सामने था। माँ ड्राईवर बुलाने की बात कह रही थीपर उसने सोचा अब इतनी रात को इतना जल्दी ड्राईवर कहाँ आ पायेगा यह कहते हुये उसने सहज जिद और अपने मजबूत कंधो के सहारे बाऊजी को कार में बिठाया और तेज़ी से हॉस्पिटल की ओर भागा। बाउजी दर्द से कराहने के साथ ही उसे डांट भी रहे थे "धीरे चला नालायकएक काम जो इससे ठीक से हो जाए।" नालायक बोला "आप ज्यादा बातें ना करें बाउजीबस तेज़ साँसें लेते रहियेहम हॉस्पिटल पहुँचने वाले हैं।"

अस्पताल पहुँचकर उन्हे डाक्टरों की निगरानी में सौंपवो बाहर चहलकदमी करने लगाबचपन से आज तक अपने लिये वो नालायक ही सुनते आया था। उसने भी कहीं न कहीं अपने मन में यह स्वीकार कर लिया था की उसका नाम ही शायद नालायक ही हैं । तभी तो स्कूल के समय से ही घर के लगभग सब लोग कहते थे की नालायक फिर से फेल हो गया। नालायक को अपने यहाँ कोई चपरासी भी ना रखे।

कोई बेवकूफ ही इस नालायक को अपनी बेटी देगा। शादी होने के बाद भी वक्त बेवक्त सब कहते रहते हैं की इस बेचारी के भाग्य फूटें थे जो इस नालायक के पल्ले पड़ गयी। हाँ बस एक माँ ही हैं जिसने उसके असल नाम को अब तक जीवित रखा हैपर आज अगर उसके बाउजी को कुछ हो गया तो शायद वे भी.. इस ख़याल के आते ही उसकी आँखे छलक गयी और वो उनके लिये हॉस्पिटल में बने एक मंदिर में प्रार्थना में डूब गया। प्रार्थना में शक्ति थी या समस्या मामूलीडाक्टरों ने सुबह सुबह ही बाऊजी को घर जाने की अनुमति दे दी।

घर लौटकर उनके कमरे में छोड़ते हुये बाऊजी एक बार फिर चीखें, "छोड़ नालायक ! तुझे तो लगा होगा कि बूढ़ा अब लौटेगा ही नहीं।" उदास वो उस कमरे से निकलातो माँ  से अब रहा नहीं गया, "इतना सब तो करता हैबावजूद इसके आपके लिये वो नालायक ही है सागर और अभिषेक दोनो अभी तक सोये हुए हैं उन्हें तो अंदाजा तक नही हैं की रात को क्या हुआ होगा ..... बहुओं ने भी शायद उन्हें बताना उचित नही समझा होगा । यह बिना आवाज दिये आ गया और किसी को भी परेशान नही किया भगवान न करे कल को कुछ अनहोनी हो जाती तो और आप हैं की उसे शर्मिंदा करने और डांटने का एक भी मौका नही छोड़ते । कहते कहते माँ रोने लगी थी

इस बार बाऊजी ने आश्चर्य भरी नजरों से उनकी ओर देखा और फिर नज़रें नीची करली। माँ रोते रोते बोल रही थी अरेक्या कमी है हमारे  बेटे में हाँ मानती हूँ पढाई में थोड़ा कमजोर था .... तो क्या क्या सभी होशियार ही होते हैं वो अपना परिवारहम दोनों कोघर-मकानपुश्तैनी कारोबाररिश्तेदार और रिश्तेदारी सब कुछ तो बखूबी सम्भाल रहा है जबकि  बाकी दोनों जिन्हें आप लायक समझते हैं वो बेटे सिर्फ अपने बीबी और बच्चों के अलावा ज्यादा से ज्यादा अपने ससुराल का ध्यान रखते हैं । कभी पुछा आपसे की आपकी तबियत कैसी हैं और आप हैं की ....

बाऊजी बोले संगीता तुम भी मेरी भावना नही समझ पाई मेरे शब्द ही पकड़े न क्या तुझे भी यही लगता है कि इतना सब के होने बाद भी  इसे बेटा कह के नहीं बुला पाने कागले से नहीं लगा पाने का दुःख तो मुझे नही है क्या मेरा दिल पत्थर का है हाँ संगीता सच कहूँ दुःख तो मुझे भी होता ही हैपर उससे भी अधिक डर लगता है कि कहीं ये भी उनकी ही तरह लायक ना बन जाये। इसलिए मैं इसे इसकी पूर्णताः का अहसास इसे अपने जीते जी तो कभी नही होने दूगाँ ....
  
माँ चौंक गई ..... ये क्या कह रहे हैं आप हाँ संगीता ...यही सच है अब तुम चाहो तो इसे मेरा स्वार्थ ही कह लो। कहते हुये उन्होंने रोते हुए नजरे नीची किये हुए अपने हाथ माँ की तरफ जोड़ दिये जिसे माँ ने झट से अपनी हथेलियों में भर लिया। और कहा अरे ...अरे ये आप क्या कर रहे हैं  मुझे क्यो पाप का भागी बना रहे हैं । मेरी ही गलती है मैं आपको इतने वर्षों में भी पूरी तरह नही समझ पाई ......
  
और दूसरी ओर दरवाज़े पर वह नालायक खड़ा खड़ा यह सारी बातचीत सुन रहा था वो भी आंसुओं में तरबतर हो गया था। उसके मन में आया की दौड़ कर अपने बाऊजी के गले से लग जाये पर ऐसा करते ही उसके बाऊजी झेंप जातेयह सोच कर वो अपने कमरे की ओर दौड़ गया। कमरे तक पहुँचा भी नही था की बाऊजी की आवाज कानों में पड़ी . अरे नालायक .....वो दवाईयाँ कहा रख दी  गाड़ी में ही छोड़ दी क्या कितना भी समझा दो इससे एक काम भी ठीक से नही होता .... नालायक झट पट आँसू पौछते हुये गाड़ी से दवाईयाँ निकाल कर बाऊजी के कमरे की तरफ दौड़ गया ।

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Friday, November 17, 2017

हृदय परिवर्तन

    एक राजा को राज भोगते हुए काफी समय हो गया था। बाल भी सफ़ेद होने लगे थे। एक दिन उसने अपने दरबार में एक उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया। उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया।
    राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि यदि वे चाहें तो नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें। सारी रात नृत्य चलता रहा। ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी। नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है, उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा -
      बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताय।
   एक पलक के कारने, क्यों कलंक लग जाय।
   अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अलग-अलग अर्थ निकाला। तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा।
   जब यह बात गुरु जी ने सुनी तो  उन्होंने सारी मोहरें उस नर्तकी के सामने फैंक दीं।
   वही दोहा नर्तकी ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार नर्तकी को भेंट कर दिया।
   उसने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के पुत्र युवराज ने अपना मुकट उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया।
   नर्तकी फिर वही दोहा दोहराने लगी तो राजा ने कहा - "बस कर, एक दोहे से तुमने वैश्या होकर भी सबको लूट लिया है।"
   जब यह बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में आँसू आ गए और गुरु जी कहने लगे - "राजा! इसको तू वैश्या मत कह, ये तो अब मेरी गुरु बन गयी है। इसने मेरी आँखें खोल दी हैं। यह कह रही है कि मैं सारी उम्र संयमपूर्वक भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ, भाई! मैं तो चला।" यह कहकर गुरु जी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े।
   राजा की लड़की ने कहा - "पिता जी! मैं जवान हो गयी हूँ। आप आँखें बन्द किए बैठे हैं, मेरी शादी नहीं कर रहे थे और आज रात मैं आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेने वाली थी। लेकिन इस नर्तकी ने मुझे सुमति दी है कि जल्दबाजी मत कर कभी तो तेरी शादी होगी ही। क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है?"
   युवराज ने कहा - "पिता जी! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज नहीं दे रहे थे। मैंने आज रात ही आपके सिपाहियों से मिलकर आपका कत्ल करवा देने का विचार कर लिया था। लेकिन इस नर्तकी ने समझाया कि पगले! आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है। धैर्य रख।"
   जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म-ज्ञान हो गया। राजा के मन में वैराग्य आ गया। राजा ने तुरन्त फैसला लिया - "क्यों न मैं अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ।" फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा - "पुत्री! दरबार में एक से एक राजकुमार आये हुए हैं। तुम अपनी इच्छा से किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रूप में चुन सकती हो।" राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया।
   यह सब देखकर नर्तकी ने सोचा - "मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, लेकिन मैं क्यूँ नहीं सुधर पायी?" उसी समय नर्तकी में भी वैराग्य आ गया। उसने उसी समय निर्णय लिया कि आज से मैं अपना बुरा धंधा बन्द करती हूँ और कहा कि "हे प्रभु! मेरे पापों से मुझे क्षमा करना। बस, आज से मैं सिर्फ तेरा नाम सुमिरन करुँगी।"
   समझ आने की बात है, दुनिया बदलते देर नहीं लगती। एक दोहे की दो लाईनों से भी हृदय परिवर्तन हो सकता है। बस, केवल थोड़ा धैर्य रखकर चिन्तन करने की आवश्यकता है।

Sunday, November 12, 2017

तुम्हारे विचार ही तुम्हारे कर्म हैं

बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। एक शिष्य ने पूछा- "कर्म क्या है?"
बुद्ध ने कहा- "मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।"

एक राजा हाथी पर बैठकर अपने राज्य का भ्रमण कर रहा था।अचानक वह एक दुकान के सामने रुका और अपने मंत्री से कहा- "मुझे नहीं पता क्यों, पर मैं इस दुकान के स्वामी को फाँसी देना चाहता हूँ।" यह सुनकर मंत्री को बहुत दु:ख हुआ। लेकिन जब तक वह राजा से कोई कारण पूछता, तब तक राजा आगे बढ़ गया।

अगले दिन, मंत्री उस दुकानदार से मिलने के लिए एक साधारण नागरिक के वेष में उसकी दुकान पर पहुँचा। उसने दुकानदार से ऐसे ही पूछ लिया कि उसका व्यापार कैसा चल रहा है? दुकानदार चंदन की लकड़ी बेचता था। उसने बहुत दुखी होकर बताया कि मुश्किल से ही उसे कोई ग्राहक मिलता है। लोग उसकी दुकान पर आते हैं, चंदन को सूँघते हैं और चले जाते हैं। वे चंदन कि गुणवत्ता की प्रशंसा भी करते हैं, पर ख़रीदते कुछ नहीं। अब उसकी आशा केवल इस बात पर टिकी है कि राजा जल्दी ही मर जाएगा। उसकी अन्त्येष्टि के लिए बड़ी मात्रा में चंदन की लकड़ी खरीदी जाएगी। वह आसपास अकेला चंदन की लकड़ी का दुकानदार था, इसलिए उसे पक्का विश्वास था कि राजा के मरने पर उसके दिन बदलेंगे।

अब मंत्री की समझ में आ गया कि राजा उसकी दुकान के सामने क्यों रुका था और क्यों दुकानदार को मार डालने की इच्छा व्यक्त की थी। शायद दुकानदार के नकारात्मक विचारों की तरंगों ने राजा पर वैसा प्रभाव डाला था, जिसने उसके बदले में दुकानदार के प्रति अपने अन्दर उसी तरह के नकारात्मक विचारों का अनुभव किया था।

बुद्धिमान मंत्री ने इस विषय पर कुछ क्षण तक विचार किया। फिर उसने अपनी पहचान और पिछले दिन की घटना बताये बिना कुछ चन्दन की लकड़ी ख़रीदने की इच्छा व्यक्त की। दुकानदार बहुत खुश हुआ। उसने चंदन को अच्छी तरह कागज में लपेटकर मंत्री को दे दिया।

जब मंत्री महल में लौटा तो वह सीधा दरबार में गया जहाँ राजा बैठा हुआ था और सूचना दी कि चंदन की लकड़ी के दुकानदार ने उसे एक भेंट भेजी है। राजा को आश्चर्य हुआ। जब उसने बंडल को खोला तो उसमें सुनहरे रंग के श्रेष्ठ चंदन की लकड़ी और उसकी सुगंध को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। प्रसन्न होकर उसने चंदन के व्यापारी के लिए कुछ सोने के सिक्के भिजवा दिये। राजा को यह सोचकर अपने हृदय में बहुत खेद हुआ कि उसे दुकानदार को मारने का अवांछित विचार आया था।

जब दुकानदार को राजा से सोने के सिक्के प्राप्त हुए, तो वह भी आश्चर्यचकित हो गया। वह राजा के गुण गाने लगा जिसने सोने के सिक्के भेजकर उसे ग़रीबी के अभिशाप से बचा लिया था। कुछ समय बाद उसे अपने उन कलुषित विचारों की याद आयी जो वह राजा के प्रति सोचा करता था। उसे अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ऐसे नकारात्मक विचार करने पर बहुत पश्चात्ताप हुआ।

यदि हम दूसरे व्यक्तियों के प्रति अच्छे और दयालु विचार रखेंगे, तो वे सकारात्मक विचार हमारे पास अनुकूल रूप में ही लौटेंगे। लेकिन यदि हम बुरे विचारों को पालेंगे, तो वे विचार हमारे पास उसी रूप में लौटेंगे।

यह कहानी सुनाकर बुद्ध ने पूछा- "कर्म क्या है?" अनेक शिष्यों ने उत्तर दिया- "हमारे शब्द, हमारे कार्य, हमारी भावनायें, हमारी गतिविधियाँ..."

बुद्ध ने सिर हिलाया और कहा- "तुम्हारे विचार ही तुम्हारे कर्म हैं।"

Sunday, October 29, 2017

Old Man and Tree || बूढा आदमी और पेड

    एक बच्चे को आम का पेड़ बहुत पसंद था। जब भी फुर्सत मिलती वो आम के पेड के पास पहुच जाता। पेड के उपर चढ़ता,आम खाता,खेलता और थक जाने पर उसी की छाया मे सो जाता। उस बच्चे और आम के पेड के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया। बच्चा जैसे-जैसे बडा होता गया वैसे-वैसे उसने पेड के पास आना कम कर दिया। कुछ समय बाद तो बिल्कुल ही बंद हो गया। आम का पेड उस बालक को याद करके अकेला रोता।
    एक दिन अचानक पेड ने उस बच्चे को अपनी तरफ आते देखा और पास आने पर कहा, "तू कहां चला गया था? मै रोज तुम्हे याद किया करता था। चलो आज फिर से दोनो खेलते है।" बच्चे ने आम के पेड से कहा, "अब मेरी खेलने की उम्र नही है। मुझे पढना है,लेकिन मेरे पास फीस भरने के पैसे नही है।" पेड ने कहा, "तू मेरे आम लेकर बाजार मे बेच दे, इससे जो पैसे मिले अपनी फीस भर देना।" उस बच्चे ने आम के पेड से सारे आम तोड़ लिए और उन सब आमो को लेकर वहा से चला गया। उसके बाद फिर कभी दिखाई नही दिया।आम का पेड उसकी राह देखता रहता।
    एक दिन वो फिर आया और कहने लगा, "अब मुझे नौकरी मिल गई है, मेरी शादी हो चुकी है, मुझे मेरा अपना घर बनाना है,इसके लिए मेरे पास अब पैसे नही है।" आम के पेड ने कहा, "तू मेरी सभी डाली को काट कर ले जा,उससे अपना घर बना ले।" उस जवान ने पेड की सभी डाली काट ली और ले के चला गया।
    आम के पेड के पास अब कुछ नहीं था वो अब बिल्कुल बंजर हो गया था। कोई उसे देखता भी नहीं था। पेड ने भी अब वो बालक/जवान उसके पास फिर आयेगा यह उम्मीद छोड दी थी। फिर एक दिन अचानक वहाँ एक बुढा आदमी आया। उसने आम के पेड से कहा, "शायद आपने मुझे नही पहचाना, मैं वही बालक हूं जो बार-बार आपके पास आता और आप हमेशा अपने टुकड़े काटकर भी मेरी मदद करते थे।" आम के पेड ने दु:ख के साथ कहा, "पर बेटा मेरे पास अब ऐसा कुछ भी नही जो मै तुम्हे दे सकूँ।" वृद्ध ने आंखो मे आंसु लिए कहा, "आज मै आपसे कुछ लेने नही आया हूं बल्कि आज तो मुझे आपके साथ जी भरके खेलना है, आपकी गोद मे सर रखकर सो जाना है।" इतना कहकर वो आम के पेड से लिपट गया और आम के पेड की सुखी हुई डाली फिर से अंकुरित हो उठी।

वो आम का पेड़ कोई और नही हमारे माता-पिता हैं दोस्तों। जब छोटे थे उनके साथ खेलना अच्छा लगता था। जैसे-जैसे बडे होते चले गये जिम्‍मेदारियों के मायाजाल में जकडकर उनसे दूर होते गये। पास भी तब आये जब कोई जरूरत पडी, कोई समस्या खडी हुई। आज कई माँ बाप उस बंजर पेड की तरह अपने बच्चों की राह देख रहे है। जाकर उनसे लिपटे, उनके गले लग जाये। उनकी जी भर सेवा करें। फिर देखना वृद्धावस्था में उनका जीवन फिर से अंकुरित हो उठेगा।

Friday, October 27, 2017

राजा और चिड़िया || Raja Aur Chidiya || The King and the Bird

    राजा के विशाल महल में एक सुंदर वाटिका थी, जिसमें अंगूरों की एक बेल लगी थी। वहां रोज एक चिड़िया आती और मीठे अंगूर चुन-चुनकर खा जाती मगर अधपके और खट्टे अंगूरों को नीचे गिरा देती। माली ने चिड़िया को पकड़ने की बहुत कोशिश की पर वह हाथ नहीं आई। हताश होकर एक दिन माली ने राजा को यह बात बताई। यह सुनकर भानुप्रताप को आश्चर्य हुआ। उसने चिड़िया को सबक सिखाने की ठान ली। एक दिन वह वाटिका में छिपकर बैठ गया। जब चिड़िया अंगूर खाने आई तो राजा ने फुर्ती से उसे पकड़ लिया।
    जब राजा चिड़िया को मारने लगा, तो चिड़िया ने कहा, 'हे राजन, मुझे मत मारो। मैं आपको ज्ञान की 4 महत्वपूर्ण बातें बताऊंगी।' राजा ने कहा, 'जल्दी बता।' चिड़िया बोली, 'हे राजन, सबसे पहले तो हाथ में आए शत्रु को कभी मत छोड़ो।' राजा ने कहा, 'दूसरी बात बता।' चिड़िया ने कहा, 'असंभव बात पर भूलकर भी विश्वास मत करो और तीसरी बात यह है कि बीती बातों पर कभी पश्चाताप मत करो'
    राजा ने कहा, 'अब चौथी बात भी जल्दी बता दो।' इस पर चिड़िया बोली, 'चौथी बात बड़ी गूढ़ और रहस्यमयी है। मुझे जरा ढीला छोड़ दें क्योंकि मेरा दम घुट रहा है। कुछ सांस लेकर ही बता सकूंगी।' चिड़िया की बात सुन जैसे ही राजा ने अपना हाथ ढीला किया, चिड़िया उड़कर एक डाल पर बैठ गई और बोली, 'मेरे पेट में दो हीरे हैं'
    यह सुनकर राजा पश्चाताप में डूब गया। राजा की हालत देख चिड़िया बोली, 'हे राजन, ज्ञान की बात सुनने और पढ़ने से कुछ लाभ नहीं होता, उस पर अमल करने से होता है। आपने मेरी बात नहीं मानी। मैं आपकी शत्रु थी, फिर भी आपने पकड़कर मुझे छोड़ दिया। मैंने यह असंभव बात कही कि मेरे पेट में दो हीरे हैं फिर भी आपने उस पर भरोसा कर लिया। आपके हाथ में वे काल्पनिक हीरे नहीं आए तो आप पछताने लगे।

उपदेशों को जीवन में उतारे बगैर उनका कोई मोल नहीं।  

Tuesday, September 26, 2017

दृष्‍टान्‍त - एक साधु की कथा

एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा चला जा रहा था कि अपनी ही धुन में रहने वाले इस साधु ने एक मिठाई की दुकान को देखा जहां एक कढ़ाई में गरम दूध उबाला जा रहा था, तो मौसम के हिसाब से दूसरी कढ़ाई में गरमा गरम जलेबियां तैयार हो रही थी। साधु कुछ क्षणों के लिए वहाँ रुक गया। शायद भूख का एहसास हो रहा था या मौसम का असर था, साधु हलवाई की भट्ठी को बड़े गौर से देखने लगा साधु कुछ खाना चाहता था। अपनी मस्ती के बीच इस भूख को जान वह प्रभु को स्मरण कर मन ही मन कहा कि क्या क्या लीला करते होक्योंकि साधु की जेब ही नहीं थी तो पैसे भला कहां से होते.... साधु कुछ पल भट्ठी से हाथ  सेंकने के बाद चला ही जाना चाहता था कि नेक दिल हलवाई से रहा न गया और एक प्याला गरम दूध और कुछ जलेबियां साधु को दें दी। अपनी धुन का मस्त वो साधु प्रभु की मर्जी समझ गरम जलेबियां गरम दूध के साथ खाई और फिर हाथों को ऊपर की ओर उठाकर हलवाई के लिऐ प्रार्थना की, फिर आगे चल दिया। 

साधु बाबा का पेट भर चुका था दुनिया के दु:खों से बेपरवाह वे फिर इक नए जोश से बारिश के गंदले पानी के छींटे उड़ाता चला जा रहा था। वह इस बात से बेखबर था कि एक युवा नव विवाहिता जोड़ा भी वर्षा के जल से बचता बचाता उसके पीछे चला आ रहें है। एक बार इस मस्त साधु ने बारिश के गंदले पानी में जोर से लात मारी..... बारिश का पानी उड़ता हुआ सीधा पीछे आने वाली युवती के कपड़ों को भिगो गया उस औरत के कीमती कपड़े कीचड़ से लथपथ हो गये। उसके युवा पति से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई, इसलिए वह आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़ा और साधु के कपड़ो से पकड़ कर कहने लगा अंधा है...... तुमको नज़र नहीं आता तेरी हरकत की वजह से मेरी पत्नी के कपड़े गीले हो गऐ हैं और कीचड़ से भर गऐ हैं.....। 

साधु हक्का-बक्का सा खड़ा था, जबकि इस युवा को साधु का चुप रहना नाखुशगवार गुजर रहा था।महिला ने आगे बढ़कर युवा के हाथों से साधु को छुड़ाना भी चाहा, लेकिन युवा की आंखों से निकलती नफरत की चिंगारी देख वह भी फिर पीछे खिसकने पर मजबूर हो गई। राह चलते राहगीर भी उदासीनता से यह सब दृश्य देख रहे थे लेकिन युवा के गुस्से को देखकर किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रोक पाते और आख़िर जवानी के नशे मे चूर इस युवक ने एक जोरदार थप्पड़ साधु के चेहरे पर जड़ दिया बूढ़ा साधु थप्पड़ की मार से लड़खड़ाता हुऐ कीचड़ में जा पड़ा। युवक ने जब साधु को नीचे गिरता देखा तो मुस्कुराते हुए वहां से चल दिया। बूढे साधु ने आकाश की ओर देखा और उसके होठों से निकला वाह मेरे भगवान कभी गरम दूध जलेबियां और कभी गरम थप्पड़.... लेकिन जो तू चाहे मुझे भी वही पसंद है। यह कहता हुआ वह एक बार फिर अपने रास्ते पर चल दिया।

दूसरी ओर वह युवा जोड़ा अपनी मस्ती को समर्पित अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो गया। थोड़ी ही दूर चलने के बाद वे एक मकान के सामने पहुंचकर रुक गए। वह अपने घर पहुंच गए थे, वे युवा अपनी जेब से चाबी निकाल कर अपनी पत्नी से हंसी मजाक करते हुए ऊपर घर की सीढ़ियों तय कर रहा था। बारिश के कारण सीढ़ियों पर फिसलन हो गई थी अचानक युवा का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से नीचे गिरने लगा। महिला ने बहुत जोर से शोर मचा कर लोगों का ध्यान अपने पति की ओर आकर्षित करने लगी जिसकी वजह से काफी लोग तुरंत सहायता के लिये युवा की ओर लपके..... लेकिन देर हो चुकी थी युवक का सिर फट गया था और कुछ ही देर मे ज्यादा खून बह जाने के कारण इस नौजवान युवक की मौत हो चुकी थी। 

कुछ लोगों ने दूर से आते साधु बाबा को देखा तो आपस में कानाफुसी होने लगीं कि निश्चित रूप से इस साधु बाबा ने थप्पड़ खाकर युवा को श्राप दिया है, अन्यथा ऐसे नौजवान युवक का केवल सीढ़ियों से गिर कर मर जाना बड़े अचम्भे की बात लगती है। कुछ मनचले युवकों ने यह बात सुनकर साधु बाबा को घेर लिया एक युवा कहने लगा - 'आप कैसे भगवान के भक्त हैं जो केवल एक थप्पड़ के कारण युवा को श्राप दे बैठे। भगवान के भक्त मे रोष व गुस्‍सा हरगिज़ नहीं होता। आप तो जरा सी असुविधा पर भी धैर्य न कर सकें।' साधु बाबा कहने लगा भगवान की क़सम मैंने इस युवा को श्राप नहीं दिया। अगर आप ने श्राप नहीं दिया तो ऐसा नौजवान युवा सीढ़ियों से गिरकर कैसे मर गया

तब साधु बाबा ने दर्शकों से एक अनोखा सवाल किया कि आप में से कोई इस सब घटना का चश्मदीद गवाह मौजूद हैएक युवक ने आगे बढ़कर कहा, 'हाँ मैं इस सब घटना का चश्मदीद गवाह हूँ ।' साधु ने अगला सवाल किया- 'मेरे क़दमों से जो कीचड़ उछला था क्या उसने युवा के कपड़े को दागी किया था?' युवा बोला- 'नहीं...!! लेकिन महिला के कपड़े जरूर खराब हुए थे' उस मस्ताने साधु ने युवक की बाँहों को थामते हुए पूछा, ' फिर युवक ने मुझे क्यों मारा?' युवा कहने लगा-' क्योंकि वह युवा इस महिला का प्रेमी था और यह बर्दाश्त नहीं कर सका कि कोई उसके प्रेमी के कपड़ों को गंदा करे..... इसलिए उस युवक ने आपको मारा....' 

युवा की बात सुनकर साधु बाबा ने एक जोरदार ठहाका बुलंद किया और यह कहता हुआ वहाँ से विदा हो गया, 'तो भगवान की क़सम मैंने श्राप कभी किसी को नहीं दिया लेकिन कोई है जो मुझ से प्रेम रखता है। अगर उसका यार सहन नहीं कर सका तो मेरे यार को कैसे बर्दाश्त होगा कि कोई मुझे मारे और वह इतना शक्तिशाली है कि दुनिया का बड़े से बड़ा राजा भी उसकी लाठी से डरता है।मेरा यार.. , मेरा प्यार... , वो परमात्मा ही है। उस परमात्मा की लाठी दीख़ती नही और आवाज भी नही करती लेकिन पडती हैं तों बहुत दर्द देती है।'


हमारे कर्म ही हमें उसकी लाठी से बचातें हैं बस कर्म अच्छे होने चाहिये...

Sunday, January 26, 2014

पीए साहब || PA Sahab


पात्र परिचय
पीए साहब        एक बत्तीस वर्ष का नौजवान, पढ़ा-लिखा, ऊर्जावान, अच्छी कद-काठी का जवान।
बड़े बाबू         एक सरकारी कार्यालय के कार्यालय अधीक्षक, उम्र लगभग 55 वर्ष। दुबला-पतला शरीर, चेहरे एवं पहनावे से शालीन।
रामधनी        सरकारी कार्यालय का चपरासी। उम्र लगभग 50 से 55 वर्ष के बीच। कुर्ता-पाजामा पहने हुए और कन्धे पर एक गमछा रखे हुए। शरीर दुबला पतला है। चेहरे पर चमक है। शान्त स्वभाव का सीध-साधा कर्मचारी। 
मिश्राजी, शर्माजी, जावेद, अच्छेलाल - उसी सरकारी कार्यालय के अन्य कर्मचारीगण, पहनावा सामान्य।

प्रथम दृश्य
सब कुछ रोज जैसा ही चल रहा है। रामधनी ने आकर कार्यालय का दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही सफाईकर्मी अपने अपने काम में लग गये। रामधनी ने एक कुशल पर्यवेक्षक की तरह कार्यालय के कोने कोने की सफाई करवाई। जब रामधनी कार्यालय की सफाई से आश्वस्त हो गया तब उसने साहब की मेज को व्यवस्थित किया, बगिया से दौड़कर फूल लाया और गुलदस्ता सजाया। गिलास को कई बार धुल-चमकाकर साहब के लिए पीने का पानी रखा। रामधनी इस कार्यालय का सबसे पुराना चपरासी है। यह सब कार्य उसकी दैनिक दिनचर्या का अंग हैं। वह बिना चूके प्रतिदिन एक मुस्तैद सिपाही की तरह सारे कार्यों को अन्जाम देता है।

साहब के कमरे से ही लगा हुआ एक छोटा सा कमरा साहब के वैयक्तिक सहायक का है। कार्यालय में सब उन्हें पीए साहब कहते हैं। साहब-सूबा तो रौबदार होते ही हैं पीए साहब उनसे भी अधिक रौबदार हैं। साहब के कमरे की साफ-सफाई के बाद रामधनी ने उसी लगन एवं मुस्तैदी के साथ पीए साहब का कमरा व्यवस्थित किया और फिर वहीं बैठकर साहब के आने की प्रतीक्षा करने लगा।

(पीए साहब का प्रवेश। शक्ल-सूरत एवं पहनावे से अफसर सरीखे। चाल-ढाल भी अफसरों जैसी। एक पढ़े-लिखे व्यक्ति की छवि। दिमाग में पता नहीं क्या उधेड़-बुन चल रही है। लग रहा है पूरे देश की जिम्मेदारी इन्हीं के कन्धों पर जबरन लाद दी गयी हो।)

पीए (बुदबुदाते हुए)-   कैसे कामचोरों से पाला पड़ा है। एक काम भी ठीक से नहीं कर सकते। (चिल्लाते हुए) रामधनी .... रामधनी .......
रामधनी - जी साहब
पीए - ये क्या रामधनी। तुमको एक बारे में कोई चीज समझ में नहीं आती? ये फाइल फिर यहां कैसे आ गयी?
रामधनी (धीरे से)- जी.... बड़े साहब आपय के देय के कहे रहे ...।
पीए - (गुस्से से चिल्लाते हुए) - देय के कहे रहे। .... अरे देय के कहे रहे तो क्या तू मेरे सिर पर रख देगा? ...  उधर रख आलमारी में। (बुदबुदाते हुए) किसी से प्यार से बोल क्या दो सिर पर चढ़ जाते हैं। आपय के देय के कहे रहे ...
रामधनी (चुटकी लेते हुए) - साहेब आज घर से झगड़ा कइ के आये हैं का? बड़े गुस्सा मा हैं?
पीए - फालतू बकवास बन्द। जा के एक कप चाय बना के ला। और हां .... शक्कर थोड़ी ज्यादा डालना। ... (सिर पर हाथ फेरते हुए, खुद से ही ) ... सिर दर्द से फटा जा रहा है।
(रामधनी चाय बनाने के लिए जैसे ही कमरे से बाहर निकलता है, दरवाजे पर खड़े बड़े बाबूजी से टकराते-टकराते बचता है।)
रामधनी - राम राम बाबू जी।
बड़े बाबू- राम राम। ... और रामधनी ... सुबह सुबह कहां दौड़ लगा दी?
रामधनी - कुछ नहीं बाबू जी। पीए साहेब की खातिर चाय बनावे जा रहे हैं। (धीरे से) आजकल न जाने का होइ गवा है सीधे मुह बातय नहीं करते।
(बड़े बाबू और रामधनी की उम्र में ज्यादा अन्तर न था। दोनों के पचास बसन्त पूरे हो चुके थे। इस कार्यालय में दोनों ने साथ साथ बीस-बाईस बरस तक अच्छे-बुरे दिन साथ-साथ बिताये। कभी एक-दूसरे को शिकायत का मौका नहीं मिला। कभी किसी बात पर कुछ कहा सुनी हो भी गयी तो फिर कुछ ही देर में सब कुछ कहा-सुना माफ, जैसे कुछ हुआ ही न हो। उम्र के इस दौर में यदि व्यक्ति को अनावश्यक डांट-फटकार मिले तो उसका हृदय दुखी होना स्वाभाविक था।)
रामधनी (दुखी मन से) - आप तो सब जानिथ है बड़े बाबू। एतनी उमिर बीत गई। कभौ सिकाइत के मौका नहीं दिहा। ना जाने काहे आजकल पीए साहेब हमसे गुस्सा हैं। ई उमिर में ई सब बर्दास नहीं होय बाबू जी। बाबूजी हमार ड्यूटी कहूं अउर लगवाय दें। कउनव दिन हमरे मुहे से कुछ निकल गवा ....
बड़े बाबू - (बड़े बाबू ने आश्वस्त करने वाली मुस्कान के साथ रामधनी की ओर देखा और रामधनी के कंधे पर हाथ रखकर ढाढस बंधाते हुए बोले) मैं बात करता हूं। .... तुम जाओ अपना काम करो ...
(बड़े बाबू ने रामधनी को आश्वासन तो दे दिया, लेकिन वे खुद भी बड़े असमंजस में हैं कि वे पीए से कहें भी तो क्या कहें। इन दिनों कई मसलों पर उनकी खुद की पीए से कहासुनी हो चुकी है। लेकिन बड़े बाबू होने के नाते, कार्यालय का मुखिया होने के नाते ये उनका कर्तव्य है कि वे कार्यालय के अन्दर काम करने का एक अच्छा वातावरण बना कर रखें। उन्होंने हिम्मत बटोरी और चल पड़े पीए के पास)
बड़े बाबू (सौम्य मुस्कान से साथ) - क्या पीए साहब! बड़ा हो-हल्ला मचा रखा है।
पीए - ये सब आपके कारण ही हो रहा है। कार्यालय की कोई मर्यादा ही नहीं है। टके-टके के आदमी काम कम करते हैं और जुबान ज्यादा चलाते हैं। मेरे साथ ये सब न चलेगा। आप ही इन्हें अपने सिर पर बिठा कर रखिये। 
(पीए साहब और न जाने क्या-क्या बड़बड़ाते रहे। बड़े बाबू अपना सा मुंह लेकर उल्टे पांव वापस आ गये। बड़े बाबू को मन में मलाल था कि वे आखिर क्यों गये पीए के पास। उम्र में बड़े बाबू पीए के पिता के समान हैं। उनका स्वभाव इतना सीधा और सरल था कि आज तक उनपर कोई उंगली तक न उठा सका था। बड़े बाबू ने अपने चारों तरफ देखा कि किसी ने देखा या सुना तो नहीं। चलो गनीमत यही थी कि अभी कार्यालय में कोई आया नहीं था। वैसे भी सरकारी कार्यालयों में ग्यारह बजे के पहले कोई आता भी कहां है। बड़े बाबू की इज्जत इस लेट-लतीफी की वजह से बच गई। रामधनी सब सुन-देख रहा था, लेकिन बड़े बाबू को उस पर अपने से ज्यादा भरोसा था। वे जानते थे कि रामधनी ऐसी बातों का जिक्र किसी से भी नहीं करेगा। रामधनी भले ही इन बातों को जिक्र कहीं न करे लेकिन ये बातें छिपती नहीं हैं।)

द्वितीय दृश्य

आज कार्यालय में चर्चा का बाजार गर्म है। हर तरफ यही चर्चा चल रही है। सभी कुछ न कुछ बुदबुदा रहे हैं। जैसे-तैसे दोपहर हुई। लन्च का समय होते ही सभी बाबू चाय की दूकानों की तरफ चल पड़े। आज तो सबके पैरों में कुछ ज्यादा ही गति थी। सभी एक-दूसरे को पुकारते हुए कार्यालय के बाहर निकल रहे थे जैसे किसी अतिमहत्वूपर्ण मिशन पर निकल रहे हों। दूकान पर पहुंच कर।)

मिश्रा जी - आज सबकी चाय मेरी तरफ से। (दूकानदार की तरफ) गुड्डू भाई चार चाय देना और साथ में थोड़ी नमकीन भी। 
शर्मा जी - अरे चार नहीं पांच चाय देना। बड़े बाबू भी आ रहे हैं। (बड़े बाबू की तरफ) अरे बड़े बाबू जी आइये .... आइये ... इधर बैठिये ... (कुर्सी उनकी ओर सरकाते हुए)
बड़े बाबू (कुर्सी पर बैठते हुए। चेहरे पर वही सौम्य मुस्कान। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। चुटकी लेते हुए) - आज पूरा का पूरा अमला एक साथ .... क्या बात है भाई? ....
मिश्रा जी (शिकायती लहजे में) - आप तो जैसे कुछ जानते ही नहीं। ...
बड़े बाबू (स्थिर भाव से) - सही कह रहा हूं। मुझे नहीं पता। किसी का जन्मदिन है क्या आज? (प्रश्नवाचक मुद्रा में) 
जावेद - अच्छा बड़े बाबू जब आपको नहीं मालूम तो आप बैठिये और आराम से चाय पीजिए।
शर्मा जी - भाई मैं तो कहता हूं कि ऐसे आदमी के साथ अब काम करना मुश्किल है। बात-बात में गरम हो जाता है। हमारे शरीर में भी खून है। किसी दिन .....
जावेद - मुझसे तो कभी टकराया ही नहीं। नहीं तो वहीं पर दो-चार धर के आता। कोई चूड़ियां नहीं पहन रखी है। आप लोग पता नहीं कैसे बर्दाश्त करते हैं ...
अच्छेलाल - मुझे तो कोई और ही चक्कर समझ में आता है। देखते नहीं आजकल कितनी छुट्टियां लेता है। आये दिन बाहर जाता है। किसी लड़की-वड़की का ......
बड़े बाबू - अरे भाई .... ऐसी कोई बात नहीं है। मैं अच्छी तरह जानता हूं उसे। वो ऐसा लड़का नहीं है। 
मिश्रा जी - सही बात। बिना जाने समझे किसी के चरित्र पर कीचड़ नहीं उछालना चाहिए।
जावेद (मजाकिया लहजे में) - अगर किसी जिन्न या प्रेत का चक्कर हो तो मैं जानता हूं झाड़-फूंक करने वाले एक फकीर को .... बहुत पहुंचे हुए हैं ... हा हा हा ... (सभी हंसने लगते हैं)
बड़े बाबू (विचारमग्न मुद्रा में। गम्भीर स्वर में) - मुझे लगता है कि वो किसी नशे का आदी हो गया है। आज का युवा नशे का शिकार बड़ी तेजी से हो रहा है खासकर जो युवा स्वावलम्बी हैं। इसीलिए हमेशा खोया-खोया रहता है और बहकी-बहकी बातें करता है।
मिश्रा जी - बड़े बाबू .... मुझे भी यही लगता है कि वह किसी नशीली गोली का सेवन करता है। क्योंकि एक बार जब मैं उसके कमरे में गया तो वो कोई दवा खाकर पानी पी रहा था। मेरे लाख पूछने पर भी बन्दे ने न तो मर्ज बताया और न ही दवा का रैपर देखने दिया। पहले तो मैं ही उसका फैमिली वैद्य हुआ करता था। डाक्टर कुछ भी दवा लिख दे,... बन्दा मुझसे सलाह किये मजाल क्या थी कि एक भी गोली खा ले।
शर्मा जी - मुझे भी यही लगता है। देखते नहीं आजकल कैसा झुंझलाया सा रहता है। और मैंने तो यहां तक भी सुना है कि आजकल बड़े साहब से भी पटरी नहीं खा रही है।
बड़े बाबू (घड़ी देखते हुए) - अरे भाई कार्यालय नहीं चलना है क्या। जलपान का समय कब का खत्म हो गया और तुम्हारी चैपाल है कि खत्म ही नहीं होती। चलो- चलो .. (सभी उठकर कार्यालय की ओर जाते हैं। मिश्रा जी दुकानदार को पैसे देते हैं।) 

तृतीय दृश्य
पन्द्रह दिनों के बाद
आज भी कार्यालय रोज की तरह खुला, लेकिन रामधनी के चेहरे से मुस्तैदी गायब है। कार्यालय की साफ-सफाई रोज की तरह ही हुई। कार्यालय में जैसे कोई रौनक ही न हो। कार्यालय की साफ सफाई खतम हुई। धीरे-धीरे करके सभी कर्मचारी आने लगे। रोज की तरह सबसे पहले बड़े बाबू, उसके बाद मिश्राजी, शर्माजी सबसे अन्त में अच्छेलाल। सबके चेहरे पर मायूसी और प्रश्नचिह्न साफ-साफ झलक रहा था। बड़े बाबू ने बिना किसी से कोई बात किये अपनी दराज खोली और लिफाफों का एक बंडल निकाला। हर लिफाफे पर एक-एक कर्मचारी का नाम लिखा था। ये लिफाफे पीए साहब ने बड़े बाबू के पास छुट्टी जाते समय रख दिया था साथ ही निर्देश भी दिया था कि इन लिफाफों को वितरित करने का समय पीए साहब बतायेंगे। यह कौन जानता था कि पीए साहब का यह अवकाश उनका अन्तिम अवकाश है और वे कभी न खत्म होने वाले अवकाश पर चले जायेंगे। पीए साहब की असामयिक मृत्यु ने सभी को सकते में डाल दिया है। कल रात बड़े बाबू के पास पीए साहब के घर से उनकी मृत्यु की खबर आई साथ ही लिफाफे बांटने का सन्देश भी मिला। बड़े बाबू ने आज कार्यालय आकब सबसे पहले लिफाफे बांटने का ही कार्य किया। एक-एक करके सबने लिफाफे लिए। सभी लिफाफों में एक-एक खत था। सभी ने असमंजस के साथ खत खोला और पढ़ने लगे। सब अपना-अपना खत पढ़ रहे हैं और उनकी आंखों से पश्चाताप के आंसू अनायास ही बहे जा रहे हैं। किसी की हिम्मत नहीं हो रही है कि वह एक-दूसरे से आंख मिला सके या यह देख सके कि दूसरा भी रो रहा है या नहीं। बड़े बाबू ने भी अपना खत पढ़ा और खत मेज पर रखकर अपना चश्मा उतारा और आंसू पोंछे। बड़े बाबू को कुछ स्थिर देखकर.... रामधनी बड़े बाबू के पास आकर धीरे से कहता है
रामधनी - हे बड़े बाबू, तोहार गोड़ लागी ... तनी हमरव लिफफवा खाली न ....। तनी पढ़ि के सुनाई त कि हमरे पीए साहेब का लिखे हैं। हम निरक्षर आदमी ई करिया अच्छर का समझी।
बड़े बाबू (आंसू पोछकर चश्मा उठाते हैं और रामधनी से पत्र लेकर पढ़ते हैं।) - रामधनी काका, जब ये खत आपको मिलेगा तब तक मैं आपसे बहुत दूर जा चुका होउंगा। मैं जानता हूं कि मुझे ब्लड कैंसर है और बीमारी इस स्तर पर पहुंच चुकी है कि अब इसका कोई इलाज नहीं। मैं चाहता था कि मेरे जाने के बाद आप सब को दुख न हो इसलिए मैंने जानबूझ कर रूखा स्वभाव अपना लिया था। रामधनी काका आप तो मेरे पिता के समान हैं, मेरा कहा-सुना अपना बेटा मानकर भुला देना और हो सके तो मुझे माफ कर देना। 
आपका अपना
पीए साहब

Saturday, January 25, 2014

मैं भी लिख सकता हूं कविता


फिर आया है याद मुझे कि
मैं भी लिख सकता हूं कविता।
नभ-जल-थल-आकाश विषय पर,
जीवन के एहसास, समय पर
भूली बिसरी यादों पर
पूस-माघ और भादों पर
जीवन में जो घटता-बचता
मैं भी लिख सकता हूं कविता।

जीना-मरना, जस-अपजस पर
यति-गत, नीरस और सरस पर
हर्ष-विषाद, सबल-निर्बल पर
हार-जीत और ठोस-तरल पर
शब्द-विलोम से रच दी कविता
मैं भी लिख सकता हूं कविता।

पक्षी-विहग-शकुनि-नभचर पर
दैत्य-दनुज-राक्षस-निशिचर पर
भानु-भास्कर-रवि-दिनकर पर
भंवरा-मधुप-भ्रमर-मधुकर पर
सम-अर्थी शब्दों की कविता
मैं भी लिख सकता हूं कविता।

नृत्य-नाच और अक्षि-आंख पर
पंच-पांच और लक्ष-लाख पर
चन्द्र-चांद और दंत-दांत पर
कर्म-काम और सप्त-सात पर
तत्सम-तद्भव की यह कविता
मैं भी लिख सकता हूं कविता।

Tuesday, October 25, 2011

अपने गुरुजनों को सादर समर्पित



गुरुजन अपने कितने प्यारे,
ब्रह्मा विष्णु शिवा हमारे,
खुद जलकर जीना सिखलाते,
जीवन राह दिखाने वाले,
मात पिता और सखा हमारे
गुरुजन अपने कितने प्यारे।

गुरु बिन ज्ञान नहीं मिलता रे,
ग्रन्थ पड़े रहते हैं सारे,
गुरु हमारे ज्ञान दीप हैं,
अन्धकार काटे हैं सारे।

सारे वन की कलम बनाकर,
सागर जल को बना के स्याही,
धरती को कागज करके भी,
गुरुगुन लिखते दुनिया हारी।

Sunday, April 10, 2011

मन की व्यथा



मन की व्यथा कहूं मैं किससे, कोई न अपना मीत यहां।
मन पंछी पिंजड़े के भीतर, इसे सुकूं अब मिले कहां।

मीठे फल के फेर में पड़ के, कर बैठा बस इतनी भूल।
समझ न पाया इस दुनिया को, यहां तो सब है सेमल फूल।

जब आया पिंजड़े के भीतर, आजादी को तब जाना।
जेल की चुपड़ी रोटी से, अच्छा है भूखे मर जाना।

एक बार का मरना अच्छा, आजादी का वरण करो।
पराधीन सपनेहुं सुख नाही, आज इसे स्मरण करो।

मानव बन मानव का बैरी, दिल पर चोट बहुत है करता।
यही सोच मैं बैठा हूं के, ऊपर वाला न्याय है करता।

सरी चोट सहूंगा दिल पे, घाव एक न दिखलाऊंगा।
मलिक तू सब देख रहा है, और किसी से न गाऊंगा।

ईश्वर तेरी लाठी में आवाज नहीं पर चोट बड़ी है।
इंतजार मैं करूंगा स्वामी, विषम घड़ी अब आन पड़ी है।

चित्र marypages.com से साभार

Thursday, January 13, 2011

एक दूजे के लिए हम बने थे नहीं


एक दूजे के लिए हम बने थे नहीं,
फिर भी प्यारा हमारा ये साथ रहा।
खुशियां बांटी हैं जीवन की मिलके सभी,
और दुख में भी तुम्हारा साथ रहा।

ये पता था हमें मिल सकेंगे नही,
फिर भी प्यारा सा इक एहसास रहा।
कच्ची डोरी से हम तुम बंधे ही नहीं
फिर भी बंधन का इक एहसास रहा।

दिल के रिश्ते हैं जो खुद ही जुड़ जाते हैं,
किसी बंधन का इनमें न भास रहा।
प्यार की डोर होती है पावन बड़ी,
इसकी मर्यादा का हमको भास रहा।

यादें दिल में बसी हैं रहेंगी सदा,
चाह कर भी न इनको भुला पाउंगा।
है यहीं मुझको ऐ मेरे प्यारे सनम,
होगे तनहाई में तो मैं याद आऊंगा।

जिन्दगी का सफर है ये लम्बा मगर
प्यार की यादों में ही गुजर जायेगा।
खुश रहो मेरे हमदम ओ मेरे सनम
दिल दुआ देगा हरदम ये दोहरायेगा।

Tuesday, October 5, 2010

कितना प्यार मुझे है तुमसे कैसे तुमको बतलाऊं


कितना प्यार मुझे है तुमसे कैसे तुमको बतलाऊं
हनूमान मैं नहीं प्रिये जो चीर कलेजा दिखलाऊं।

तुमको याद किया करता हूं मैं प्रतिपल आंहें भरता हूं
यकीं दिलाऊ कैसे तुमको प्यार बहुत मैं करता हूं।

होती जब भी बात तुम्हारी छुप-छुप कर मैं सुनता हूं
ना देखूं मैं जिस दिन तुमको पागल सा मैं लगता हूं।

प्रीत की रीत निभाऊं कैसे, मुझे नहीं है कुछ आता
बिन देखे अब चैन नहीं है, काश मैं तुमसे कह पाता।

आंखें तेरी हुई दिवानी, नहीं इन्हें हैं कुछ भाता
हर पल चाहें सूरत तेरी, दूजा कुछ भी नहीं सुहाता।

दिन में खोया-खोया रहता, नींद न आती रातों में
भरी चूड़ियां हरदम दिखतीं, मेंहदी वाले हाथों में।

हर आहट पे चौक मैं पड़ता मिलता मुझको आभास तेरा
दिल में उठती घोर निराशा जब न मिलता साथ तेरा।

खत मैंने हैं बहुत लिखे पर एक न तुमको भेज सका
डर लगता है पढ कर इनको, हो न जाओ कहीं खफा।

मैं देखूंगा बाट तुम्हारी, किया इरादा पक्का है
तुम भी मुझसे प्यार करोगी, प्यार मेरा गर सच्चा है।

चित्र  chennai.olx.in से साभार